ये ग़म और दुनिया जो हम-ख़ू रही है
उदासी बदन के तो हर-सू रही है
दरारें हुई हैं मेरे जिस्म हर दिन
वही मेरी अब आब-दरजू रही है
निगाहों से तुम ने है जिस को था चाहा
उसी की ज़माने में ख़ुशबू रही है
तलाशा गया ज़िंदगी को यहाँ जो
ख़ुशी और ग़म हम-तराजू रही है
ये रुत्बा ये दौलत न अज़मत किसी की
तुम्हारी ख़ुशी हौले ग़म छू रही है
तुम्हें अब न रोना यहाँ और होगा
न जब ज़िंदगी यार क़ाबू रही है
ख़ुदा की बनाई हुई है ये दुनिया
हमेशा ख़ुदा के जो क़ाबू रही है
— Lalit Mohan Joshi















