नहीं अब वो मेरी अमानत नहीं है
उसे मेरी अब तो ज़रूरत नहीं है
तुम्हें गर मैं चाहूँ तो दिल से है चाहा
मेरी कोशिशों में सियासत नहीं है
सजाऊँगा फूलों से अपनी ग़ज़ल को
हज़ाक़त यहीं है हिमाक़त नहीं है
सुनो शे'र पढ़ कर न अंकुर बुलाया
सही फिर तुम्हारी निज़ामत नहीं है
न आँखों में जलवा न चेहरे पे रौनक़
गई जो मुहब्बत तो बरकत नहीं है
पड़ी सिलवटें जो बदन में मेरे यूँ
पता गर तुम्हें हो शिकायत नहीं है
मैं टूटा तो कोई सदा तक न आई
करूँ अब सदा मैं ये ताक़त नहीं है
वो घर जो बनाए थे मिट्टी में हम ने
कहाँ हैं ये पूछो तो फ़ुर्सत नहीं है
हमें महफ़िलों में बुलाते नहीं हो
ये अच्छी तो कोई शरारत नहीं है
मुझे याद उस ने किया कॉल कर के
मुझे ऐसे छल की ज़रूरत नहीं है
वो ट्विटर पे रोया बहुत देर तक कल
सियासत हुई थी हक़ीक़त नहीं है
यहाँ दर्द बाँटे कोई ऐसा लाओ
दवा से भी अब तो वो राहत नहीं है
घरों के है रिश्ते लगे फ़ोन में है
उन्हें बात करने की फ़ुर्सत नहीं है
कहाँ आ गया और क्या देखता हूँ
यहाँ जान की कोई क़ीमत नहीं है
गले में हो रस्सी किसी वास्ते जो
यहाँ मेरी ऐसी तो आदत नहीं है
'ललित' क्या करोगे यहाँ बीच रह कर
तुम्हारी अगर कोई अज़मत नहीं है















