तुम ने कर ली यार अब शादी मुबारकबाद है

हम हुए ग़म- ख़्वार अब शादी मुबारकबाद है

सोचता हूँ दूर हो कर उस को क्या हासिल हुआ
जब उसे था प्यार अब शादी मुबारकबाद है

तुम किताबों से निकलकर दूर हम से हो गए
हम हुए बेज़ार अब शादी मुबारकबाद है

काँच जैसे टूट कर बिखरा बदन मेरा पड़ा
तुम ही थे आधार अब शादी मुबारकबाद है

राब्ते दिल तोड़ते हैं ये नई बातें नहीं
रिश्ते हैं बाज़ार अब शादी मुबारकबाद है

जो नहीं होना था सो वो हो गया तो ठीक है
है ये क़िस्मत यार अब शादी मुबारकबाद है

हर दुआ सजदे में माँगा ग़ैर की तुम हो गई
छोड़ो ज़िक्र-ओ-ज़ार अब शादी मुबारकबाद है

हम किताबें ओढ़कर बस फ़र्ज़ की चादर लिए
हो कहाँ से प्यार अब शादी मुबारकबाद है

यार जिस से घर सँभाले भी सँभलता था नहीं
घर की है मुख़्तार अब शादी मुबारकबाद है

क्या ग़लत था क्या सही था सोचते हैं प्यार में
क्यूँ हुआ व्यापार अब शादी मुबारकबाद है

तुम बसे दुनिया की रस्मों में किसी के साथ थे
हम बने असरार अब शादी मुबारकबाद है

हम ने जो देखे थे मिल के यार वो मंज़र यहाँ
भूल बैठे यार अब शादी मुबारकबाद है

दर्द अब रुकता नहीं लेकिन सताता भी नहीं
जैसे हो इक यार अब शादी मुबारकबाद है

अब किताबें और प्याली चाय रहती साथ में
ख़ुद से है इज़हार अब शादी मुबारकबाद है

ग़म भुलाकर यूँ 'ललित' अपनी ग़ज़ल कहता रहा
जैसे हो मय-ख़्वार अब शादी मुबारकबाद है

— Lalit Mohan Joshi

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