"ये ज़माने वाले कहाँ कब"
ये ज़माने वाले कहाँ कब मुझ को याद करते हैं
ये अपने किसी काम के सिलसिले में बात करते हैं
अपनी ख़ुशियों में कहाँ ये मुझ को शामिल करते हैं
ये बस अँधेरे से डरकर मुझ को याद करते हैं
अपना हक़ जताने को हमेशा से आतुर दिखते हैं
ये ज़माने वाले हैं जनाब बड़े बे-दर्द हुआ करते हैं
रोना इनको किसी अपनी बात पे ही आता है
वर्ना ये किसी के ग़म में कहाँ रोया करते हैं
मैं ने जितनी दफ़ा ख़ुद को सँभाला इस ज़माने में
ये सब उतनी दफ़ा ही मुझ को गिरा दिया करते हैं
मैं न जाने किन लोगों के वास्ते रहता हूँ परेशान
जो अक्सर मुझे परेशानियों में छोड़ दिया करते हैं
— Lalit Mohan Joshi















