"ज़िंदगी है क्या"

बे-मन उम्र गुजारना ज़िंदगी है क्या
रोज़ टूट कर बिखरना ज़िंदगी है क्या
हम को रोज़ आकार हर कोई जीने लगता है
और उस का आकार चले जाना ज़िंदगी है क्या
ज़िंदगी कितना और सीखना है
मुझ पर ये तेरा सितम ढाना ज़िंदगी है क्या
दो वक़्त की रोटी के ख़ातिर
हर दर पर हाथ फैलाना ज़िंदगी है क्या
अगर तुम रखते हो ज़रूरी डिग्री-याफ़्ता
तो एक भली नौकरी को तरसना ज़िंदगी है क्या

मुसलसल ख़्वाबों के लिए जगना
और उन ख़्वाबों का टूटना ज़िंदगी है क्या
कुछ नए तजरबे सीखने के ख़ातिर
अंगारों पे यूँ रोज़ चलना ज़िंदगी है क्या
जवानी के इस सुहाने सफ़र पर
मोहब्बत के लिए दर बदर भटकना ज़िंदगी है क्या
ये मसअला समझ आया ही नहीं
चोट खाना और फिर सँभालना ज़िंदगी है क्या
एक दो नंबरों के खेल में
ख़ुद को तबाह करना ज़िंदगी है क्या
जितना कम हुआ नंबरों का अंतर
उतना नौकरी से दूर जाना ज़िंदगी है क्या
गाँव से शहर आया था एक सुलझा लड़का
उस का यहाँ उलझ कर रहना ज़िंदगी है क्या

— Lalit Mohan Joshi

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