पसीना बहाता चल
पसीना अपने माथे से बहाता चल
गीत अपनी जीत के यूँ गाता चल
मंज़िल परखती है तो परखने दे
फिर भी रोज़ नया क़दम बढ़ाता चल
वक़्त देगा अपने हिसाब से मगर
हर रोज़ नई ग़ज़लें सुनाता चल
बहर बे-बहर सब को भूल पहले तो
ख़यालों के साथ ख़ुद को बहाता चल
महफ़िल आज तेरे हक़ में नहीं है तो क्या
मगर तू अपने दिलकश नज़ारे सुनाता चल
आँधियों ने रास्ता कब किस का रोका है
तू बस इनको अपना ठेंगा दिखाता चल
सुब्ह इक रोज़ दर्द से तड़पा था मगर
माँ की दुआ को यादकर ख़ुद को जगाता चल
हिंदू मुस्लिम मंदिर मस्जिद क्या रक्खा है
तू बस बेहतर ख़ुद को इंसान बनाता चल
ख़ुदा ने क्यूँ भेजा है तुझ को यहाँ पता है
तू भी ख़ुद को बस बेहतर इंसान बनाता चल















