हुक्मरान

लूटा है मुफ़्लिसी भूख ने मेरे देश को
लूटा है इन अमीरों ने मेरे देश को
और डंके की चोट पर कहता हूँ मैं
बदलते हुक्मरानों ने लूटा है मेरे देश को
रोते बच्चे के हाथ में जैसे देते हैं खिलौना
वैसे ये हुक्मरान चुप कराते हैं मेरे देश को

कैसे कैसे प्रलोभन से अपने कुकर्म छुपाते हैं
ये हुक्मरान ऐसे बहलाते फुसलाते हैं मेरे देश को
झूठ इन के बिकते हैं सर-ए-बाज़ार में
इस बाज़ार का हर दुकानदार डराता है मेरे को
चुप हैं लब सी गए हैं ग़लत है
सो ये ज़ख़्म पे ज़ख़्म देते हैं मेरे देश को
सुना है चुनावी समय है चलो कुछ करते हैं
सबब बताते हैं उन को जो आँख दिखाते हैं मेरे देश को

— Lalit Mohan Joshi

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