उदासी यार अब चेहरे तलक आने लगी है
हँसी चेहरे से मेरे अब गुज़र जाने लगी है
सभी इक रोज मुझको ढूँढ़ते पागल फिरेंगे
नहीं गर मैं मिला दुनिया ये हकलाने लगी है
कहीं दिन तो कही वो रात भी होगी यक़ीनन
कहानी ज़िंदगी ऐसी ही लिखवाने लगी है
कटे ये रात रोने और रोने में बहुत ही
ये आँखें अब तो ऐसे ख़ुद को समझाने लगी है
सुना मैने फ़क़ीरी भी हुआ करती है अच्छी
ललित को देखकर दुनिया यूँँ घबराने लगी है
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