झूठी क़समों का मुझे रोज़ हवाला दे कर
छीन लेता है सहारा वो सहारा दे कर
छीन लेता है सहारा वो सहारा दे कर
वो नसीहत मुझे देता है सँभलने की रोज़
और ख़ुद मय भी पिलाता है पियाला दे कर
मुद्दतों उसने निगहबानी में रक्खा मुझ को
और तोड़ा है भरोसा भी भरोसा दे कर
इस क़दर डूब न जाना कहीं भी दरिया में
लौटना टूटे सफ़ीने को किनारा दे कर
मैं ने हँसते हुए चेहरे से किया है रुख़्सत
और लौटा हूँ मिरे ग़म को तमाचा दे कर
मरने वाला किसी को याद कहाँ आता है
वो तो मर जाता है दुनिया को इशारा दे कर
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एक चिंगारी को ऐसे वो हवा देता था
आग के बनने से पहले ही बुझा देता था
आग के बनने से पहले ही बुझा देता था
इस तरह से वो चराग़ों को सज़ा देता था
सुब्ह होते ही उन्हें रोज़ जला देता था
जैसे ही कोई नया ख़्वाब सजाता था मैं
लम्स तेरा मुझे नींदों से जगा देता था
पूछिए मत कोई हद मेरे तअल्लुक़ की अब
मेरा तो हाल वो आँखों से बता देता था
तन्हा रहने का उसे शौक़ लगा था मानो
रोज़ पेड़ों से परिंदों को उड़ा देता था
काटता था वो अँधेरों में जो टहनी हर शब
उन को फलने की उजालों में दुआ देता था
आइना झूठ नहीं बोलता था पहले कभी
किस की दस्तार गिरेगी ये बता देता था
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मुड़ के भी देखा नहीं जाते हुए उस ने हमें
रह गई होगी कमी कोई पज़ीराई में
रह गई होगी कमी कोई पज़ीराई में
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वर्ना तो है ही क्या जो मिरे घर में नहीं है
पर चाहिए जो शख़्स मुक़द्दर में नहीं है
पर चाहिए जो शख़्स मुक़द्दर में नहीं है
हर रोज़ सताती है यही बात मुझे तो
क्यूँ बेहतरी उस की मेरे बेहतर में नहीं है
इक बार भी सोचे कभी घर तोड़ने के बा'द
इतनी सी मुहब्बत भी सितमगर में नहीं है
ढोता हूँ सभी ज़ख़्म यही सोच के मैं तो
जो बात तेरे ढब में है ख़ंजर में नहीं है
तुम लूट के ले जाते हो साहिल के ख़ज़ाने
फिर सोचते हो नर्मी समंदर में नहीं है
कह देता है क्यूँ शे'र वो हालात पे मेरे
क्या थोड़ी सी भी अक़्ल सुख़न-वर में नहीं है
हर रोज़ यही सोच के जाता हूँ कमाने
ग़ुर्बत मेरे बच्चों के मुक़द्दर में नहीं है
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इस क़दर भा गई है इश्क़ में तन्हाई हमें
तेरी बाहों में भी फिर नींद नहीं आई हमें
तेरी बाहों में भी फिर नींद नहीं आई हमें
जब से सूखे हैं निगाहों से हमारे आँसू
तोड़ पाई है कहाँ कोई भी रुसवाई हमें
दे गई फिर से नए ज़ख़्म बड़ी शिद्दत से
ग़ैर की बाहों में लिपटी तेरी परछाई हमें
डूबते वक़्त किसी को न पुकारा हम ने
देखते रह गए साहिल के तमाशाई हमें
छोड़ के जा तू हमें और पता चलने दे
कौन से मरहले पे ले गई बरनाई हमें
डूबने पर ही तो मालूम हुई है जानाँ
तेरी हँसती हुई आँखों की ये गहराई हमें
रास्ते क़ीमती भी होते हैं आख़िर ये बात
आज मंज़िल पे पहुँच कर ही समझ आई हमें
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मैं किसी रोज़ रोऊँगा इतना कि फिर
कोई यादों का मंज़र दिखाई न दे
कोई यादों का मंज़र दिखाई न दे
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मिरे घर में मुहब्बत का हर इक सामान बाक़ी है
तिरा ग़म है नशा है और मुझ में जान बाक़ी है
तिरा ग़म है नशा है और मुझ में जान बाक़ी है
मिरे दिल में यही इक आख़िरी अरमान बाक़ी है
अभी तुझ पे लिखी इक नज़्म का उन्वान बाक़ी है
ये उम्र-ए-इंतिज़ार-ए-इश्क़ बढ़ती ही रहेगी यूँ
तिरे लौट आने का जब तक कोई इम्कान बाक़ी है
मिटाएगा कहाँ तक तू मिरे दिल के उजालों को
मेरी नज़रों में अब भी एक रौशनदान बाक़ी है
गुज़रते दौर ने मुझ को यही इक बात समझाई
जहाँ दरबान ज़िंदा है वहीं ईमान बाक़ी है
मुहब्बत के मकाँ तो ढह गए सब दिल मुहल्ले में
तुझे जो आना है तो आ बस इक दालान बाक़ी है
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मुद्दतों के बा'द एक लंबा इंतिज़ार कर
माज़ी अब निकल पड़ा है पैरहन उतार कर
अपने हम-नफ़स को अपना ख़ास राज़दार कर
क़त्ल कर लिया है ख़ुद का उस पे ऐतिबार कर
जिस के दाग़ मैं ने अपने ख़ून से भी धोए हैं
क़र्ज़ वो चुका रहा है मुझ को दाग़दार कर
ये ग़म-ए-फ़िराक़ दश्त में सराब जैसा था
लोग तो बड़े ही ख़ुश थे मुझ को दर किनार कर
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जिन पत्थरों को ज़िंदगी ने मौत दी
बेजान वो पत्थर ख़ुदा होने लगे
तुम ने मिरे ज़ख़्मों को यूँ छू क्या लिया
फिर ज़ख़्म तो जैसे हवा होने लगे
जब से मिरी आँखों की बीनाई गई
घर के दिए भी बे-वफ़ा होने लगे
उन को ज़रूरत ही नहीं है अब मिरी
अब काम जो मेरे बिना होने लगे
हम ने जिसे भी फिर दु'आओं में पढ़ा
उस के लिए हम बद-दु'आ होने लगे
तेरे अलावा सिर्फ़ तू था ज़ीस्त में
अब सब मिरे तेरे सिवा होने लगे
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कभी जब अपने घर की याद आती है
परिंदों को भी आज़ादी सताती है
परिंदों को भी आज़ादी सताती है
मुझे वैसे तो कोई ग़म नहीं है बस
मुझे हर रोज़ उस की याद आती है
मुझे हर रोज़ जबरन जीना पड़ता है
मिरी ये ज़ीस्त ग़म ही ग़म लुटाती है
उसे इन पत्थरों से क्यूँ न हो वहशत
वो भी तो ख़्वाब शीशे के सजाती है
चराग़ों को शिकायत है तो बस इतनी
हवा हर दफ़्अ उन को भूल जाती है
ग़मों से गहरे रिश्ते हो चले मेरे
ज़ियादा अब ख़ुशी मुझ को रुलाती है
अलग ही बोझ हूँ इस ज़िंदगी पे मैं
ये तुर्बत देख मुझ को मुस्कुराती है
अगर बीमार हूँ तो रहने दो मुझ को
दवा क्यूँ मेरी चौखट खटखटाती है
मिटाता हूँ वफ़ा के क़िस्से पन्नों से
मुहब्बत की सियाही अब सताती है
नज़र-अंदाज़ मैं कर ही नहीं सकता
उसी की बाहों में अब नींद आती है
ख़मोशी उस के चेहरे पे नहीं सजती
वो अच्छी लगती है जब गीत गाती है
कभी महताब सच को रौशनी देगा
इसी उम्मीद में शब बीत जाती है
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