इशारा कोई तो कर दो कि वापस आ रहे हो तुम
किसी के क़दमों की आहट मेरी जानिब को आती है
रही होगी हवा की कुछ तो रंजिश
च़रागों को बुझा देती है आकर
कभी कर लूँ यहाँ पर मैं सुसाइड
ये ख़ामोशी डरा देती है आकर
कि अब मैं मुस्कुराना चाहता हूॅं
क़ज़ा के पास जाना चाहता हूॅं
मिरे दामन को कोई थाम ले अब
मैं ज़ख़्मों को भुलाना चाहता हूॅं
बनाया घर गया मुझसे न कोई
मैं सबका घर गिराना चाहता हूॅं
कि तुमसे अब निभा सकता नहीं मैं
ये बंधन तोड़ जाना चाहता हूॅं
मुताबिक़ मैं हवा के आज चल के जा रहा हूँ अब
खबर क्या ये हवा कल भी मुवाफ़िक़ चल सकेगी क्या
हमें दिल को लगाना चाहिए था
इसे भी आज़माना चाहिए था
अकेले का नहीं था देख ज़िम्मा
तुझे भी पास आना चाहिए था
सबब होता नहीं है शाद का यूँ
हमें कोई बहाना चाहिए था
हुई क्या थी ख़ता मेरी तरफ़ से
हक़ीक़त को बताना चाहिए था
ख़ुशी के क़त्ल के बाबत उदासी
तुझे भी जेल जाना चाहिए था
बहक जाते मगर हम भी यहाँ पर
ज़रा मौसम सुहाना चाहिए था
किताबों की तहों के बीच सूखे
गुलाबों को दिखाना चाहिए था
किनारे बैठकर अब सोचना क्या
हमें तो डूब जाना चाहिए था