हम को चोट लगती है जब गले लगाते हैं
क्या करें कि पत्थर से दिल लगा लिया हम ने
सोच कर ही रक्खा था हम ने इस ज़मीं पर पैर
यार ख़ुद को दलदल में फिर फॅंसा लिया हम ने
घर में रौशनी जो थी उस का एक ज़रिया था
वो चराग़ भी ख़ुद से बस बुझा लिया हम ने
कौन अब पड़ोसी है कुछ ख़बर नहीं हम को
शहर-ए-अजनबी में अब घर बना लिया हम ने
एक रोज़ बस की थी ऐसे जीने की कोशिश
फिर बग़ैर उस के भी दिन बिता लिया हम ने
रात दिन बताते थे ख़ुद की ग़लतियाँ सब को
पर वही किया सबने तो मज़ा लिया हम ने
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दिल तोड़ने के काम में बेबाक होकर क्या मिला
ऐ यार तुझ को इश्क़ में नापाक होकर क्या मिला
ऐ यार तुझ को इश्क़ में नापाक होकर क्या मिला
जो आँखों में ही डूबता था अब ग़मों में डूबा है
बस डूबता ही है तो फिर तैराक होकर क्या मिला
ये नौकरी थोड़ी न है आदत लगी है इक मुझे
वरना मुझे यूँ रातभर ग़मनाक होकर क्या मिला
यूँ तो हज़ारों और भी थे रास्ते बस मौत के
फिर ये बताओ इश्क़ में ही ख़ाक होकर क्या मिला
बस इक यही तो था जहाँ पे सिर्फ़ दिल का काम था
तुझ को 'भुवन' फिर इश्क़ में चालाक होकर क्या मिला
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अपना ही घर समझता रहा उस मकान को
परवाह तारे की न थी पर आसमान को
परवाह तारे की न थी पर आसमान को
बर्बाद कर के उम्र मिरी उस ने ये कहा
बस तुम नहीं पसंद मिरे ख़ानदान को
वो सारे फूल तोड़ गया उस को कुछ नहीं
सबने बुरा कहा भी तो बस बाग़बान को
उस को पता था मुझ को मोहब्बत है इस लिए
वो छेड़ता था ज़ख़्म के हर इक निशान को
वो कारोबार करता है अब रोज़ इश्क़ का
अब रोज़ वो सजाता है अपनी दुकान को
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अपने इश्क़ को मेरे रास्ते लगा लेना
या कहानी में अपने फ़लसफ़े लगा लेना
या कहानी में अपने फ़लसफ़े लगा लेना
तू अगर दिखे तो बस देखता रहूॅंगा मैं
मैं अगर दिखूँ तो मुझ को गले लगा लेना
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हिज्र की रात या हफ़्ता भी मुझे याद नहीं
उस के ग़म में मिरा रहना भी मुझे याद नहीं
उस के ग़म में मिरा रहना भी मुझे याद नहीं
एक अर्सा हो गया अब तो उसे देखे हुए
हाल यूँॅं है कि वो चेहरा भी मुझे याद नहीं
हिज्र में उस के सुनाता था कई ग़ज़लें मैं
आजकल तो कोई मिस्रा भी मुझे याद नहीं
शहर तक जाता था गलियों में फ़क़त खोने को
अब तो उस शहर का रस्ता भी मुझे याद नहीं
अब नहीं मुझ
में हुनर प्यार मोहब्बत वाला
दिल लगाने का तरीक़ा भी मुझे याद नहीं
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