हिज्र की रात या हफ़्ता भी मुझे याद नहीं
उसके ग़म में मिरा रहना भी मुझे याद नहीं
एक अर्सा हो गया अब तो उसे देखे हुए
हाल यूँॅं है कि वो चेहरा भी मुझे याद नहीं
हिज्र में उसके सुनाता था कई ग़ज़लें मैं
आजकल तो कोई मिस्रा भी मुझे याद नहीं
शहर तक जाता था गलियों में फ़क़त खोने को
अब तो उस शहर का रस्ता भी मुझे याद नहीं
अब नहीं मुझ
में हुनर प्यार मोहब्बत वाला
दिल लगाने का तरीक़ा भी मुझे याद नहीं
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Bhuwan Singh
our suggestion based on Bhuwan Singh
As you were reading Raasta Shayari Shayari