hijr kii raat ya hafta bhi mujhe yaad nahin | हिज्र की रात या हफ़्ता भी मुझे याद नहीं

  - Bhuwan Singh

हिज्र की रात या हफ़्ता भी मुझे याद नहीं
उसके ग़म में मिरा रहना भी मुझे याद नहीं

एक अर्सा हो गया अब तो उसे देखे हुए
हाल यूँॅं है कि वो चेहरा भी मुझे याद नहीं

हिज्र में उसके सुनाता था कई ग़ज़लें मैं
आजकल तो कोई मिस्रा भी मुझे याद नहीं

शहर तक जाता था गलियों में फ़क़त खोने को
अब तो उस शहर का रस्ता भी मुझे याद नहीं

अब नहीं मुझ
में हुनर प्यार मोहब्बत वाला
दिल लगाने का तरीक़ा भी मुझे याद नहीं

  - Bhuwan Singh

Raasta Shayari

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