har or 'ishq ka manzar pasand tha pahle | हर ओर 'इश्क़ का मंज़र पसंद था पहले

  - Bhuwan Singh

हर ओर 'इश्क़ का मंज़र पसंद था पहले
मुझे भी एक समंदर पसंद था पहले

वो सर्द रातों में मुझको गले लगाती थी
बस इसलिए ही दिसंबर पसंद था पहले

फिर उसने हाथ भी छूने नहीं दिए अपने
जिसे छुवन मेरा लब पर पसंद था पहले

चुरा के ले गया फिर वो मेरी मोहब्बत को
वही उसे जो इक अफ़सर पसंद था पहले

अब और कोई इशारों पे नाचता है पर
मदारी को यही बंदर पसंद था पहले

वो सिलवटें थी किसी ग़ैर की जलाना पड़ा
वगरना मुझको वो बिस्तर पसंद था पहले

अब उसको चाहिए सरकारी नौकरी वाला
उसे तो यार ये शायर पसंद था पहले

  - Bhuwan Singh

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