अपना ही घर समझता रहा उस मकान को
परवाह तारे की न थी पर आसमान को
बर्बाद करके 'उम्र मिरी उसने ये कहा
बस तुम नहीं पसंद मिरे ख़ानदान को
वो सारे फूल तोड़ गया उसको कुछ नहीं
सबने बुरा कहा भी तो बस बाग़बान को
उसको पता था मुझको मोहब्बत है इसलिए
वो छेड़ता था ज़ख़्म के हर इक निशान को
वो कारोबार करता है अब रोज़ 'इश्क़ का
अब रोज़ वो सजाता है अपनी दुकान को
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Bhuwan Singh
our suggestion based on Bhuwan Singh
As you were reading Basant Shayari Shayari