वस्ल चाहते थे पर हिज्र पा लिया हमने
ज़िंदगी में फिर अपनी ग़म बढ़ा लिया हमने
हमको चोट लगती है जब गले लगाते हैं
क्या करें कि पत्थर से दिल लगा लिया हमने
सोचकर ही रक्खा था हमने इस ज़मीं पर पैर
यार ख़ुद को दलदल में फिर फॅंसा लिया हमने
घर में रौशनी जो थी उसका एक ज़रिया था
वो चराग़ भी ख़ुद से बस बुझा लिया हमने
कौन अब पड़ोसी है कुछ ख़बर नहीं हमको
शहर-ए-अजनबी में अब घर बना लिया हमने
एक रोज़ बस की थी ऐसे जीने की कोशिश
फिर बग़ैर उसके भी दिन बिता लिया हमने
रात दिन बताते थे ख़ुद की ग़लतियाँ सबको
पर वही किया सबने तो मज़ा लिया हमने
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