सब सोचते थे पहले कि क़िस्मत का हाथ है
मैं ने कहा भी सब से कि मेहनत का हाथ है
मैं शेर-ओ-शायरी की बदौलत यहाँ पे हूँ
सब कहते है कि इस
में उस औरत का हाथ है
हाथों में आप के है लकीरें तबाही की
या'नी हर एक हाथ मुसीबत का हाथ है
कैसे मेरी ज़मीन रक़ीबों में बँट गई
क्या इस
में आप ही की हुकूमत का हाथ है
ज़ख़्मों को मैं सबूत बना कर कहाँ फिरूँ
हर सम्त उस के साथ अदालत का हाथ है
दोनों के बीच फ़ासले आने थे आ गए
और इस
में तो फ़क़त मेरी ग़ुर्बत का हाथ है
लैला से पहले जैसा भी था क़ैस क़ैस था
मजनूँ बनाने में तो मोहब्बत का हाथ है
— Bhuwan Singh















