Zaan Farzaan

Top 10 of Zaan Farzaan

    उम्मीद-ए-तरब मेरे इस दिल को अभी भी है
    हाँ ग़म हैं बहुत से पर वो रब तो अभी भी है
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    कभी तो आ जाए कोई एक साल मेरा
    कि जिस में बेहतर हो ये मलूल हाल मेरा

    कहीं मुसव्विर को भूल तो नहीं बैठा
    ये जो है वहम-ए-ज़ेबाई-ओ-जमाल मेरा
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    गर चाहत का कोई पैमाना होता
    मैं ने तेरी चाहत को मापा होता
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    जब उस से मैं ने पूछी हसरतें उस की
    रहा वो हसरतों से देखता मुझ को
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    कहते हैं ऐ इंसान तू अशरफ़-उल-मख़्लूक़ात है
    ढूँढ़ आख़िर तुझ में भला कौन सी ऐसी बात है
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    “अच्छा सोचेंगे”
    अच्छा अच्छा सोचोगे
    तो अच्छा अच्छा होगा
    सच में ऐसा होता है
    क्या सच में ऐसा होगा
    अच्छा सोचेंगे तो क्या
    अच्छे से दिन गुज़रेंगे
    नींद आएगी अच्छे से
    अच्छे मंज़र आएँगे
    होगा हाल-ए-दिल अच्छा
    फ़म अच्छा ही बोलेगा
    तन में होगा ज़ोर अच्छा
    गोश अच्छा सुन पाएगा
    नैन अच्छा ही देखेंगे
    साँस अच्छी ही आएगी
    हर आलम अच्छा होगा
    हर आफ़त टल जाएगी
    कहते हो ये सब होगा
    सारे दुख मिट जाएँगे
    अच्छा अच्छा सोचेंगे
    हम भी अच्छा सोचेंगे
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    जाने वो कितनी आगे हो
    जिस मंज़िल के तुम पीछे हो

    तुम से कैसे बोले कोई
    क्यूँ उखड़े उखड़े रहते हो

    कर बैठे ना ख़ुद को रुसवा
    जो मन में आए करते हो

    बाहरस इतना हँसते हो
    अंदर से कितना रोते हो

    पूरा तन है लर्ज़ां देखो
    क्यूँ मेरे नज़दीक आते हो

    लड़ते हैं अपनों की ख़ातिर
    तुम तो अपनों से लड़ते हो

    हर इक हिस्सा इस दुनिया का
    मन ही मन में घूम आते हो

    साथ अपने रक्खो तुम मुझ को
    तुम बिल्कुल मेरे जैसे हो

    तुम को सब हसरत से ताकें
    तो क्या तुम इतने महँगे हो

    महबूबा की या सपनों की
    तुम किस की ख़ातिर जागे हो

    ख़ुशबू ही ख़ुशबू है हर-सू
    शायद तुम घर से निकले हो

    रब से तुम को माँगा है तो
    कह सकता हूँ तुम मेरे हो
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    Zaan Farzaan
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    हमीं हैं रिफ़ाक़त में जाँ देते हैं
    वगरना सभी बस गुमाँ देते हैं

    कभी बात हम बस पते की करें
    कभी उल्टे सीधे बयाँ देते हैं

    कभी छोटे लोगों में बैठा नहीं
    बड़े ख़्वाब इजाज़त कहाँ देते हैं

    परे आसमाँ के है कोई जिसे
    यूँ आवाज़ दोनों जहाँ देते हैं

    कमी बाग़बानी में थी सो चलो
    चमन को नया बाग़बाँ देते हैं

    हिदायत मिले जाने कब ही तुम्हें
    मुअज़्ज़िन तो अब भी अज़ाँ देते हैं

    किराए पे रहते थे ख़ुद जो कभी
    किराए पे अब वो मकाँ देते हैं

    मुकरते नहीं हम किसी हाल पर
    अगर हम किसी को ज़बाँ देते हैं

    ख़ुदा जानता है कि साबिर हैं हम
    सो हाँ रोज़-ओ-शब इम्तिहाँ देते हैं

    तेरी चश्म-ए-गिरया के धोके सदा
    बहुत सो को दर्द-ए-निहाँ देते हैं

    भले मौसमों में भी कैसा सुकूँ
    सभी कुछ वो कर राएगाँ देते हैं

    करूँ ख़ूबियों का अगर ज़िक्र मैं
    गिना वो मेरी ख़ामियाँ देते हैं
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    कोई तो था तेरे जैसा बाज़-औक़ात
    ख़ैर वो आलम तो बस था बाज़-औक़ात

    ख़ूब बातें करती है तन्हाई मुझ से
    कुछ यूँ रहता हूँ मैं तन्हा बाज़-औक़ात

    ज़ोर पर चलता कहाँ है क़िस्मतों पर
    चाहा है क्या क्या न करना बाज़-औक़ात

    है मुयस्सर ज़ीस्त इस ताकीद पर अब
    ज़्यादा मरना और जीना बाज़-औक़ात

    माना था तुझ को सबब अपनी ख़ुशी का
    पर बड़ा तू ने रुलाया बाज़-औक़ात

    क़ब्र पर बच्चे की कहता वो ग़नी बाप
    कुछ नहीं कर पाता पैसा बाज़-औक़ात

    कैसे पूरे कर सकूँगा अपने सपने
    एक आध आता है सपना बाज़-औक़ात

    सोचने से दोस्त आख़िर क्या ही होगा
    मैं ने ऐसा भी है सोचा बाज़-औक़ात
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    Zaan Farzaan
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    दूरी है मंज़ूर उस को
    कर दे फिर अब दूर उस को

    ख़ुद को ही बदनाम कर के
    क्यूँ किया मशहूर उस को

    इस अना ने अपनी ख़ातिर
    कर दिया महजूर उस को

    टूटे दिल मालूम तो हो
    दुनिया का दस्तूर उस को

    अब जुदा मग़मूम है क्यूँ
    होना था मसरूर उस को

    छीन लो बीनाई मेरी
    करना है बे-नूर उस को

    शिर्क में था वो ख़ुदाया
    करता क्यूँ मग़्फ़ूर उस को

    "ज़ान" फिर भी पिघले ये दिल
    देखे जब मजबूर उस को
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    Zaan Farzaan
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