इश्क़ इस कदर कुछ दोनों के हिस्से में आया
    हमने बारहा खोया तुमने बारहा पाया

    अगली ज़िन्दगी में तुम मैं बनो ये देखो फिर
    किस कदर मुहब्बत में तुमने हमको तड़पाया

    तेरे जाने के बाद आए न जाने क्या मौसम
    छाँव चुभती है अब तक बारिशों ने झुलसाया

    वो वफ़ा की बातें ताउम्र साथ का वादा
    ये पुराने चर्चे हैं हमने मन को बहलाया

    अब नहीं सवेरा बेबार उसके होने से
    रात भर जली लौ में हमने ख़ुद को समझाया
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    Prashant Beybaar
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    कुहरा जो देखा उसने ठिठराके मुझसे पूछा
    मौसम ये सर्द है या हसरत जली है कोई
    Prashant Beybaar
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    किनारे दो मिलाने में हैं कितनी मुश्किलें सोचो
    ये पुल दिन भर ही सीने पे बिचारा चोट खाता है
    Prashant Beybaar
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    किसी सीने पे आहट दी, किसी काँधे पे सर रक्खा
    हुए कितने भी बेपरवाह मगर बस एक घर रक्खा

    ज़माने ने ये साजिश की, किसी के हम न हो पाएं
    ख़ुदी पे आशना लेकिन हमीं ने हर पहर रक्खा

    वो चलता है तो अक्सर आदतन ग़म भूल जाता है
    यही बस सोचकर हमने बड़ा लम्बा सफ़र रक्खा

    अकेलापन ही रहता है वफ़ा के रेगज़ारों में
    यूँ ही बस दिल बहल जाए सो हमने इक शजर रक्खा

    तिरे हर दर्द को 'बेबार' नाज़ों से सँभाले है
    मुझे जिस हाल में छोड़ा, उसी को फिर बसर रक्खा
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    Prashant Beybaar
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    हमारे बीच में जो है, बचाके रखते हैं
    अब एक दूजे से दूरी बनाके रखते हैं
    Prashant Beybaar
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    किसी सीने पे आहट दी, किसी काँधे पे सर रक्खा
    हुए कितने भी बेपरवाह मगर बस एक घर रक्खा
    Prashant Beybaar
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    प्यास हूँ सहरा की मैं, इक बूँद पानी चाहिए
    या गुमाँ रखने को दरिया की निशानी चाहिए

    भूल जाने के उसे, किस्से बहुत से याद हैं
    याद करने को मगर कोई कहानी चाहिए
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    Prashant Beybaar
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    फूल दिल तक़दीर में आए बहुत
    पर हमें पत्थर के मन भाए बहुत

    राह के काँटों से रक्खा राबता
    पाँव के छाले भी शरमाए बहुत

    नक़्श देखे रोज़ उसके इक वही
    आइना अपने पे इतराए बहुत

    जान लेकर भी शराफ़त देखिए
    नुस्ख़े वो जीने के बतलाए बहुत

    जब तवक़्क़ो ही नहीं इस ज़ीस्त से
    फिर हमें दुनिया क्यूँ समझाए बहुत
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    Prashant Beybaar
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    भले हैं फ़ासले क़ुर्बत से ख़ौफ़ लगता है
    ये क्या बला है जो ऐसी विरानी क़ैद हुई
    Prashant Beybaar
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    काग़ज़ की कश्ती
    उन रोज़ जब बचपन में
    कोई पनारा बहता था
    मन काग़ज़ की कश्ती बनाकर
    संग संग उसके रहता था

    हम कश्तियाँ बना बना कर
    बारिश में बहाते रहते
    पनारा मिलता नाले में
    नाले मिलते दरिया में
    कोई कश्ती तो पहुँची होगी
    हम जागे रहते दुपहरिया में

    क्या ख़ूब ठिठोली होती थी
    वक़्त की मीठी गोली होती थी
    अभी अभी पता चला
    वो ऊपर बैठा खेल रहा है
    बना बना के भेज रहा है कश्तियाँ
    दरिया-ए-वक़्त में बहने के लिए

    कुछ गल जाएँगी
    कुछ डूब जाएँगी
    कुछ के गीले लुथड़े पहुँचेंगे
    लमहों की लहरों में फँसकर

    फिर से ख़ूब ठिठोली होगी ऊपर
    काग़ज़ की कश्ती का खेल मुसलसल
    वो मालिक हद-ए-वक़्त तक पहुँचाएँगे
    हम उसी ठिठोली की ख़ातिर
    गल गल कर बह जाएँगे.
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    Prashant Beybaar
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