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उन्होंने चार लफ़्ज़ों में ही दिल की बात कह डाली
हमें इक उम्र बीती बोलने में हाल-ए-दिल अपना
हमें इक उम्र बीती बोलने में हाल-ए-दिल अपना
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Surendra Bhatia "Salil"
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जो हज़रत पूछ बैठे हैं मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
उन्हें पूछो उन्होंने क्या मेरी हालत नहीं देखी
मैं शाइ'र हूँ तो इनको लग रहा है जीत जाऊँगा
रक़ीबों ने अभी शायद मेरी ग़ुर्बत नहीं देखी
नहीं आएगा मिलने अब किसी का हो चुका है वो
मगर ईमान ने इंसान की फ़ितरत नहीं देखी
तराशे जाते हैं सब कोयले भी साथ हीरे के
जिसे शुब्हा है उस ने ताक़त-ए-सोहबत नहीं देखी
मेरी मसरूफ़ियत का हाल देखो अपने ही घर में
महीनों हो गए रहते अभी तक छत नहीं देखी
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"काश"
काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता
नहीं मुझ को नहीं कोई दर्द देते हर्फ़ मिटाने
न ही कोई बेरहम सी याद यादों से मिटानी है
मुझे बस फिर से जीना है तेरे मेरे उन लम्हों को
जिन्हें बीते हुए भी एक मुद्दत बीतने को है
मुझे बस फिर से सुननी है फ़ज़ूली गुफ़्तगू अपनी
जो अब भी कान के परदों में अक्सर गूँजती सी है
मुझे बस फिर से छूना है तेरे नाज़ुक से गालों को
के जिन पर आ के वो नन्ही शरारत बिखर जाती थी
काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता
Read Fullनहीं मुझ को नहीं कोई दर्द देते हर्फ़ मिटाने
न ही कोई बेरहम सी याद यादों से मिटानी है
मुझे बस फिर से जीना है तेरे मेरे उन लम्हों को
जिन्हें बीते हुए भी एक मुद्दत बीतने को है
मुझे बस फिर से सुननी है फ़ज़ूली गुफ़्तगू अपनी
जो अब भी कान के परदों में अक्सर गूँजती सी है
मुझे बस फिर से छूना है तेरे नाज़ुक से गालों को
के जिन पर आ के वो नन्ही शरारत बिखर जाती थी
काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता
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"मोहब्बत ये नहीं होती"
मोहब्बत ये नहीं होती कि उस की सुर्ख़ आँखों में
मेरी चाहत का काजल आब कोई रोकने पाए
मोहब्बत ये नहीं होती कि उस के लब खुलें हर सू
ओ उन पर ज़िक्र मेरा बारहा आए कभी जाए
मोहब्बत उस की ज़ुल्फों की ज़रा भीनी सी ख़ुशबू है
हवा के मन्द झोंकों को जो बरबस संदला कर दे
या उस का मेरी बाहों में समाकर टूटना अक्सर
मेरी धड़कन बढ़ाकर फिर मुझे अपना बना जाए
Read Fullमेरी चाहत का काजल आब कोई रोकने पाए
मोहब्बत ये नहीं होती कि उस के लब खुलें हर सू
ओ उन पर ज़िक्र मेरा बारहा आए कभी जाए
मोहब्बत उस की ज़ुल्फों की ज़रा भीनी सी ख़ुशबू है
हवा के मन्द झोंकों को जो बरबस संदला कर दे
या उस का मेरी बाहों में समाकर टूटना अक्सर
मेरी धड़कन बढ़ाकर फिर मुझे अपना बना जाए
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"क़ुव्वत"
अगर मैं चाँद भी चाहूँ तो मुझ
में इतनी क़ुव्वत है
कि ला कर अपने क़दमों में उसे मैं रख भी सकती हूँ
ज़रूरत ही नहीं मुझ को किसी ऐसे सहारे की
ज़रूरतमंद होने का मुझे एहसास दिलवाए
न ही अपना कहाने वाला कोई हाथ माँगूँ मैं
कि जिस को थामने की क़ीमतें भरनी पड़े मुझ को
मुझे बस दौड़ने और भागने गिरने की आज़ादी
फ़क़त इतनी सी चाहत है कि अब ये ज़िन्दगी दे दे
Read Fullमें इतनी क़ुव्वत है
कि ला कर अपने क़दमों में उसे मैं रख भी सकती हूँ
ज़रूरत ही नहीं मुझ को किसी ऐसे सहारे की
ज़रूरतमंद होने का मुझे एहसास दिलवाए
न ही अपना कहाने वाला कोई हाथ माँगूँ मैं
कि जिस को थामने की क़ीमतें भरनी पड़े मुझ को
मुझे बस दौड़ने और भागने गिरने की आज़ादी
फ़क़त इतनी सी चाहत है कि अब ये ज़िन्दगी दे दे
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"नाकाम कोशिश"
तू गुज़रे सामने से जब भी, मैं महसूस करता हूँ
तेरी रग़बत छुपाने की हर इक नाकाम कोशिश को
सदाएं दिल से आती हैं, लबों को बंद रख चाहे
तेरी नज़रें चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को
वो दिन भी था, ये दिन भी है, न छोड़ा था, न थामा है
अभी तक तू ने, "मुझ" को "हम", न इनकारा न माना है
अब इस इक़रार और इनकार की बेतुक लड़ाई से
तेरी ख़ुद को बचाने की हर इक नाकाम कोशिश को
वो गलियाँ, जिन पे चलते सोचती थी देखता हूँ मैं
वो नुक्कड़, जिस पे नज़रें चार अक्सर हो ही जाती थी
उसी शीशम के पत्तों से गुजरती इन हवाओं से
तेरी दामन चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को
मगर मैं अब भी सुनता हूँ तेरे दिल की सदाओं को
तेरी इक़रार और इनकार में उलझी वफाओं को
तेरे दामन को बरबस छेड़ती सी इन हवाओं को
गो तुझ को भूलने की इक नई नाकाम कोशिश को
Read Fullतेरी रग़बत छुपाने की हर इक नाकाम कोशिश को
सदाएं दिल से आती हैं, लबों को बंद रख चाहे
तेरी नज़रें चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को
वो दिन भी था, ये दिन भी है, न छोड़ा था, न थामा है
अभी तक तू ने, "मुझ" को "हम", न इनकारा न माना है
अब इस इक़रार और इनकार की बेतुक लड़ाई से
तेरी ख़ुद को बचाने की हर इक नाकाम कोशिश को
वो गलियाँ, जिन पे चलते सोचती थी देखता हूँ मैं
वो नुक्कड़, जिस पे नज़रें चार अक्सर हो ही जाती थी
उसी शीशम के पत्तों से गुजरती इन हवाओं से
तेरी दामन चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को
मगर मैं अब भी सुनता हूँ तेरे दिल की सदाओं को
तेरी इक़रार और इनकार में उलझी वफाओं को
तेरे दामन को बरबस छेड़ती सी इन हवाओं को
गो तुझ को भूलने की इक नई नाकाम कोशिश को
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