बाद मुद्दत के अब मिली हो तुम
    और थोड़ा सा खिल गई हो तुम

    फिर से सत्रह का हो गया हूँ मैं
    फिर से सत्रह की हो गई हो तुम

    पाक नापाक की जिरह से परे
    मुझ से मुझ सी ही फिर मिली हो तुम

    सारी दुनिया ये क्या है धोखा है
    एक बस मैं या इक खरी हो तुम

    मिल के हम हम कहाँ रहे हैं अब
    मैं सुख़न-वर हूँ शायरी हो तुम
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    मयस्सर ही नहीं इंसान को ज़ीनत रिहाई की
    मगर तुर्रे सियासत के कभी बातें ख़ुदाई की

    तुम्हारी रूह तक गिरवी तुम्हारा जिस्म तक गहना
    तो फिर कैसी बिनाहों पर ये तहरीरें वफ़ाई की

    ये शोशेबाज़ियाँ बे-जाँ बुतों में जान भरते हो
    मदारी हो नज़ूमी हो या है फ़ितरत जफ़ाई की

    तबाही उनकी दीदा भर का खेला है रहो चौकस
    वो देखा और कल अख़बार की सुर्ख़ी रिसाई की
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    मोहब्बत का महीना भी गया सूरत नहीं देखी
    तेरे इस इश्क़ी सौदाई ने कुछ बरकत नहीं देखी

    जो हज़रत पूछ बैठे हैं मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
    उन्हें पूछो उन्होंने क्या मेरी हालत नहीं देखी

    मैं शायर हूँ तो इनको लग रहा है जीत जाऊँगा
    रक़ीबों ने अभी शायद मेरी ग़ुर्बत नहीं देखी

    नहीं आएगा मिलने अब किसी का हो चुका है वो
    मगर ईमान ने इंसान की फ़ितरत नहीं देखी

    तराशे जाते हैं सब कोयले भी साथ हीरे के
    जिसे शुब्हा है उसने ताक़त-ए-सोहबत नहीं देखी

    मेरी मसरूफ़ियत का हाल देखो अपने ही घर में
    महीनों हो गए रहते अभी तक छत नहीं देखी
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    "काश"
    काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता

    नहीं मुझको नहीं कोई दर्द देते हर्फ़ मिटाने
    न ही कोई बेरहम सी याद यादों से मिटानी है

    मुझे बस फिर से जीना है तेरे मेरे उन लम्हों को
    जिन्हें बीते हुए भी एक मुद्दत बीतने को है

    मुझे बस फिर से सुननी है फ़ज़ूली गुफ़्तगू अपनी
    जो अब भी कान के परदों में अक्सर गूँजती सी है

    मुझे बस फिर से छूना है तेरे नाज़ुक से गालों को
    के जिन पर आ के वो नन्ही शरारत बिखर जाती थी

    काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    "मोहब्बत ये नहीं होती"
    मोहब्बत ये नहीं होती कि उसकी सुर्ख़ आँखों में
    मेरी चाहत का काजल आब कोई रोकने पाए

    मोहब्बत ये नहीं होती कि उसके लब खुलें हर सू
    ओ उन पर ज़िक्र मेरा बारहा आए कभी जाए

    मोहब्बत उसकी ज़ुल्फों की ज़रा भीनी सी ख़ुशबू है
    हवा के मन्द झोंकों को जो बरबस संदला कर दे

    या उसका मेरी बाहों में समाकर टूटना अक्सर
    मेरी धड़कन बढ़ाकर फिर मुझे अपना बना जाए
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    "क़ुव्वत"
    अगर मैं चाँद भी चाहूँ तो मुझमें इतनी क़ुव्वत है
    कि लाकर अपने क़दमों में उसे मैं रख भी सकती हूँ
    ज़रूरत ही नहीं मुझको किसी ऐसे सहारे की
    ज़रूरतमंद होने का मुझे एहसास दिलवाए
    न ही अपना कहाने वाला कोई हाथ माँगूँ मैं
    कि जिसको थामने की क़ीमतें भरनी पड़े मुझको
    मुझे बस दौड़ने और भागने गिरने की आज़ादी
    फ़क़त इतनी सी चाहत है कि अब ये ज़िन्दगी दे दे
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    कहाँ तो आसमाँ तक गाँव में परवाज़ होती थी
    यहाँ अँगड़ाई भी लो हाथ जा के छत में लगता है
    Surendra Bhatia "Salil"
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    "नाकाम कोशिश"
    तू गुज़रे सामने से जब भी, मैं महसूस करता हूँ
    तेरी रग़बत छुपाने की हर इक नाकाम कोशिश को

    सदाएं दिल से आती हैं, लबों को बंद रख चाहे
    तेरी नज़रें चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को

    वो दिन भी था, ये दिन भी है, न छोड़ा था, न थामा है
    अभी तक तूने, "मुझ" को "हम", न इनकारा न माना है
    अब इस इक़रार और इनकार की बेतुक लड़ाई से
    तेरी ख़ुद को बचाने की हर इक नाकाम कोशिश को

    वो गलियाँ, जिन पे चलते सोचती थी देखता हूँ मैं
    वो नुक्कड़, जिस पे नज़रें चार अक्सर हो ही जाती थी
    उसी शीशम के पत्तों से गुजरती इन हवाओं से
    तेरी दामन चुराने की हर इक नाकाम कोशिश को

    मगर मैं अब भी सुनता हूँ तेरे दिल की सदाओं को
    तेरी इक़रार और इनकार में उलझी वफाओं को

    तेरे दामन को बरबस छेड़ती सी इन हवाओं को
    गो तुझको भूलने की इक नयी नाकाम कोशिश को
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    Surendra Bhatia "Salil"
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    वो कहती है कि लाखों हैं मगर शायर नहीं तुम सा
    सलिल तुम बात भी कह दो ग़ज़ल मालूम होती है
    Surendra Bhatia "Salil"
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    वही जज़्बा-ए-साहिल तोड़ने को लश्कर-ए-मौजाँ
    समंदर तुझ से तो कुछ और ही उम्मीद थी मुझको
    Surendra Bhatia "Salil"
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