"क़ुव्वत"
अगर मैं चाँद भी चाहूँ तो मुझ
में इतनी क़ुव्वत है
कि ला कर अपने क़दमों में उसे मैं रख भी सकती हूँ
ज़रूरत ही नहीं मुझ को किसी ऐसे सहारे की
ज़रूरतमंद होने का मुझे एहसास दिलवाए
न ही अपना कहाने वाला कोई हाथ माँगूँ मैं
कि जिस को थामने की क़ीमतें भरनी पड़े मुझ को
मुझे बस दौड़ने और भागने गिरने की आज़ादी
फ़क़त इतनी सी चाहत है कि अब ये ज़िन्दगी दे दे
— Surendra Bhatia "Salil"















