तेरे लबों को हम नशे का जाम कहते हैं
तभी तो लोग भी तेरा ग़ुलाम कहते हैं
हम इतनी दूर हाल-ए-दिल सुनाने आए थे
अभी कहाँ ज़रा ढले तो शाम कहते हैं
मिली नज़र से जो नज़र तो फेर ली नज़र
इसी को हम ग़रीब इंतिक़ाम कहते हैं
वहाँ पे दिल नहीं ख़ज़ाने लाख चाहे हों
तेरी गली को दूर से सलाम कहते हैं
सिखा रखा है माँ ने एहतिराम सब का ही
तो जो मिले उसी से राम राम कहते हैं
हमें ये ख़ामुशी बचाए बैठी है अभी
'सलिल' ज़बाँ जले जो तेरा नाम कहते हैं
— Surendra Bhatia "Salil"















