Shivam Rathore

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    कितनी मुश्किल दास्ताँ है ज़िन्दगी
    ख़्वाब का इक आसमाँ है ज़िन्दगी

    सच पे नम्बर कम मिले है हर दफ़ा
    क्या अजब का इम्तिहाँ है ज़िन्दगी

    रूह तेरी बस किराएदार है
    बोल मत ख़ुद का मकाँ है ज़िन्दगी

    नफ़रतें हैं और दुख हैं बस यहाँ
    अब बताओ तुम कहाँ है ज़िन्दगी

    मान लो तो खेल ही है वरना फिर
    मुश्किलों का कारवाँ है ज़िन्दगी
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    गुस्सा प्यार हया नादानी यौवन सादगी और अदा
    सचमुच तुम तो इंद्रधनुष से ज़्यादा सुंदर लगती हो
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    वो ख़ुशबू भी अब इस चमन में नहीं है
    जो तू मेरे दिल के भवन में नहीं है

    छुअन की जो शीतलता तुझसे मिली थी
    कहीं अब वो बहती पवन में नहीं है

    किसे देख कर हम समर्पण करेंगे
    वो जादू किसी के नयन में नहीं है

    कमी तितलियों ने निकाली है ऐसी
    तिरे जैसा रस अब सुमन में नहीं है

    तुम्हारे सुरों सी मधुरता कहाँ है
    लगे जैसे कोयल ही वन में नहीं है

    दिखें तेरे भीतर ही सातों अजूबे
    सो चाहत कोई और मन में नहीं है
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    वो मुझसे रूठ जाती है तो दिल मेरा ये कहता है
    ख़िज़ाँ के बाद आएँगी बहारें लौट कर इक दिन
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    रूठ कर जब वो घर गया होगा
    शीशे सा फ़िर बिखर गया होगा

    आइना भी झगड़ रहा था कल
    क्योंकि चेहरा उतर गया होगा

    साथ रह कर भी रो दिया था जो
    दूर वो किस क़दर गया होगा

    इश्क़ था बस उफ़ान पर कल तक
    आज दरिया उतर गया होगा

    क्या मिलेगा उसे सिवा ग़म के
    ग़म मिलेगा जिधर गया होगा
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    भले रक्खा सजाकर घर को हथियारों से उसने पर
    हुनर से हम वहीं से एक गुलदस्ता निकालेंगे
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    भूखे को सूखी रोटी का टुकड़ा अच्छा लगता है
    बात करे वो तल्ख़ भी उसका लहजा अच्छा लगता है

    सोच समझकर चलता हूँ, सड़कों पर मैं गाड़ी से अब
    मुझको मेरी माँ का हँसता चेहरा अच्छा लगता है

    बात अलग है मजबूरी में, क्या क्या करना पड़ता है
    वरना नन्हें काधों पर तो , बस्ता अच्छा लगता है

    एक तरफ़ रख ख़ुशियाँ सारी खुलकर रो भी सकता हूँ
    गर तू कह दे तुझको चेहरा रोता अच्छा लगता है
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    हो गई है दूर इतना आदमी से ज़िन्दगी
    ज़िन्दगी ही माँगती है ज़िन्दगी से ज़िन्दगी

    ख़ुद चराग़ों को बुझा कर सोचता हूँ बेवजह
    क्यों ख़फ़ा है यार मेरी रौशनी से ज़िन्दगी

    बाँटने को ग़म हमें जब मिल न पाया यार तो
    कट रही है अब हमारी शायरी से ज़िन्दगी
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    चिंगारी से दीप जलाया जा सकता है
    रफ़्ता रफ़्ता प्यार बढ़ाया जा सकता है

    सबसे पहले रूह को उसकी छू लेना तुम
    तब जा कर ही हाथ लगाया जा सकता है
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    झूठ भी वो क्या हुनर से बोलता है देखना
    सच तुम्हारा सच के जैसा लग न पाएगा तुम्हें
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