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माथे पे उस के मेरे होंठों का बल वही है
तो जान ले ना मेरी जाने ग़ज़ल वही है
तो जान ले ना मेरी जाने ग़ज़ल वही है
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ऐसे शगुफ़्ता रंग गुज़िश्ता कभी न था
मैं फूल था मगर तेरे दर का कभी न था
मैं फूल था मगर तेरे दर का कभी न था
इतना तेरे दयार से मुझ को अता हुआ
इतना नसीब ने मेरे सोचा कभी न था
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नज़र, अब ख़्वाब से आँखों की कुछ बनती नहीं आती
कई दिन से पड़ोसी छत पे वो लड़की नहीं आती
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