Atul K Rai

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    तेरे दर पर तेरी ख़ातिर बता ना
    हमें रोना पड़े, अच्छा लगेगा?

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    ज़रा धैर्य रखिए सघन वन दिखेगा
    ये पेड़ों के पत्ते गिराने के दिन हैं

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    मर्म हँसने का समझ पाए ज़रा हम देर से
    वस्ल जिसको कह रहे थे हिज्र की बुनियाद थी

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    पुराने घाव पर नाखून उसका लग गया वरना
    गुज़र कर दर्द ये हद से दवा होने ही वाला था

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    मुहब्बत में जो माथा चूम कर वादा किया उसने
    उसे भी आम बातों का ही दर्जा दे दिया उसने

    सुधा के नाम पर विषपान अब हमसे नहीं होगा
    सुना ज्यूँ ही मुहब्बत से किनारा कर लिया उसने

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    गिरो तो इतनी ऊँचाई से गिरना
    लगे जैसे हवा में उड़ रहे हो

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    आप ही कहते थे सस्ता खोजिए
    आप ही अब यार अच्छा खोजिए

    जो मुहब्बत करके भी आबाद हों
    एक लड़की और लड़का खोजिए

    वरना रह जाएंँगे चक्कर काटते
    केंद्र तक जाने का रस्ता खोजिए

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    वही लड़की जो गोरी थी वही काली निकलती है
    अगर साज़िश के पीछे आपकी वाली निकलती है

    कभी ससुराल जाकर के मनाकर देखिए होली
    कभी सरहज निकलती है कभी साली निकलती है

    मुहल्ले की सभी भउजाइयों का रंग देवर पर
    उतरता है तो बरबस होंट से गाली निकलती है

    करें क्या हम कहो जानांँ कहीं टिकुली कहीं पायल
    कहीं तकिए के नीचे कान की बाली निकलती है

    जहांँ सब लोग पागल हैं करें सब क़ैद मुट्ठी में
    सभी की अंत में मुट्ठी वहीं ख़ाली निकलती है

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    जिसे मंज़िल बताया जा रहा था
    वो रस्ते के सिवा कुछ भी नहीं है

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    लटकन झटकन ओढ़ मटकते एक परी का दिख जाना,
    प्लेन गुजरने पर बचपन के खुश होने सा लगता है!

    बिन्दी, लिपस्टिक, चूड़ी, कंगन और किनारा साड़ी का,
    लाल कलर पर कब्ज़ा अय हय कितना अच्छा लगता है!

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