
नज़र, अब ख़्वाब से आँखों की कुछ बनती नहीं आती
कई दिन से पड़ोसी छत पे वो लड़की नहीं आती
यही आदत तग़ाफ़ुल की बुरी लगती तुम्हारी है
इधर हम याद करते है, उधर हिचकी नहीं आती
— Ali Mohammed Shaikh
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