Shivam Rathore

Shivam Rathore

@shivamrathore14u

Shivam Rathore shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shivam Rathore's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

7

Content

37

Likes

37

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

ग़ुस्सा प्यार हया नादानी यौवन सादगी और अदा सचमुच तुम तो इंद्रधनुष से ज़्यादा सुंदर लगती हो — Shivam Rathore
सूरज है तू मिरा तुझे मैं देख कर खिलूँ सूरज-मुखी के फूल सी है ज़िंदगी मेरी — Shivam Rathore
भले रक्खा सजाकर घर को हथियारों से उस ने पर हुनर से हम वहीं से एक गुलदस्ता निकालेंगे — Shivam Rathore
झूठ भी वो क्या हुनर से बोलता है देखना सच तुम्हारा सच के जैसा लग न पाएगा तुम्हें — Shivam Rathore
सुनो इक बात कहता हूँ भरोसा फ़्यूल जैसा है बिना जिस के कभी रिश्तों की गाड़ी चल नहीं सकती — Shivam Rathore
हर दिन कोई ज़ुर्म करें हम तेरी बाँहें जेल अगर हों — Shivam Rathore
वो मुझ सेे रूठ जाती है तो दिल मेरा ये कहता है ख़िज़ाँ के बा'द आएँगी बहारें लौट कर इक दिन — Shivam Rathore

Ghazal

वज़्न ट्रेनों का फ़क़त ज्यूँँ पटरियाँ ही जानती हैं बाप की मजबूरियाँ बस बेटियाँ ही जानती हैं इश्क़ कितना है ज़रूरी तुम नहीं समझे कभी भी क़ीमती कितना है पानी मछलियाँ ही जानती हैं ख़्वाहिशों का क़त्ल कर के है क़फ़स में क़ैद अब जो बेबसी उस आदमी की बेड़ियाँ ही जानती हैं काम करना है ज़रूरी धूप क्या है बारिशें क्या भूख मज़दूरों की बस दो रोटियाँ ही जानती हैं पक्की सड़कों की तरफ़ जो चल पड़ा है अब ज़माना दर्द तन्हाई का बस पगडंडियाँ ही जानती हैं मंदिरों में मस्ज़िदों में और गिरजाघर में जा कर मैं ने क्या माँगा है मेरी अर्ज़ियाँ ही जानती हैं वक़्त से पहले जवानी क्यूँ ढली है इनसे पूछो ज़िन्दगी की मुश्किलें ये झुर्रियाँ ही जानती हैं छोड़ दे कॉलेज तू अब पढ़ सिलेबस ज़िन्दगी का कुछ नहीं है डिग्रियों में डिग्रियाँ ही जानती हैं — Shivam Rathore
आपने समझा दिया है दिल-लगी का फ़ाइदा मैं वगरना सोचता था ख़ुद-कुशी का फ़ाइदा जिस की ग़लती पर मैं चुप था वो गले से आ लगा इस सेे अच्छा और क्या हो ख़ामुशी का फ़ायदा घर किसी का जल रहा है मैं भला ख़ुश कैसे हूँ हो नहीं सकता मुझे इस रौशनी का फ़ायदा दूर है जब से ज़माना पास ख़ुद के आ गया इस तरह उट्ठा लिया हूँ बे-रुख़ी का फ़ायदा कासा-ए-दिल सामने फैला दिया उन के मगर इश्क़ में फिर भी न पाया मुफ़लिसी का फ़ायदा राएगाँ है ज़िन्दगी जिस ज़िन्दगी में तुम नहीं फिर भला कैसे उठाए ज़िन्दगी का फ़ायदा धूप में दिन भर जले हम हो शफ़क़ के मुन्तज़िर चल दिए सब हम ने देखा आख़िरी का फ़ायदा मार डाले सारे मोहरे यार ने इक चाल में यार ही क्या वो जो ले ले बेबसी का फ़ायदा बोलने से भी डरें जिस घर में घर की औरतें सोचो मर्दो क्या है इस मर्दानगी का फ़ायदा चाहता तो चूम लेता छू भी लेता हर जगह दोस्ती में क्या ही लूँ पर बेसुधी का फ़ायदा ढूँढ़ता है क्यूँ 'शिवा' तू अब सुकून-ए-क़ल्ब को धन कमा तू भी उठा ले नौकरी का फ़ायदा — Shivam Rathore
मेरी आँखों में क्या है आँख भर कर देख लेना तुम मुहब्ब्त का ये दरिया है उतर कर देख लेना तुम मैं बाहरस जो दिखता हूँ वही अंदर से हूँ यारों है फिर भी शक तो कोई और बेहतर देख लेना तुम मिले माँ बाप तुम को ये किसी जन्नत से कम है क्या अनाथों की भरी आँखों का सागर देख लेना तुम मुहब्ब्त का किराया भर नहीं पाए तो भटकोगे रखे मालिक भरोसा जो वहाँ घर देख लेना तुम चमक सोने सी आएगी हुनर जीने का आएगा मुहब्ब्त नाम की भट्टी में तपकर देख लेना तुम कभी भी ज़िन्दगी के एक पहलू से न घबराना सरल हो प्रश्न पर्चे को पलटकर देख लेना तुम बिछा रक्खा है मेरा दिल यहाँ कालीन के बदले कभी मेरी गली से बस गुज़र कर देख लेना तुम अगर हिम्मत न हो जीने की मरना रास आए तो शिवा की ज़िंदगी का एक मंज़र देख लेना तुम — Shivam Rathore
इमारत है नहीं पक्की हमारे गाँव में यारो मगर कुटिया है कुछ अच्छी हमारे गाँव में यारो ज़रूरत ही नहीं लगती कि डालें इत्र कमरे में महकती है सदा मिट्टी हमारे गाँव में यारो हमारे यार मिलते हैं हमें पीपल के साए में सभा चौपाल पर सजती हमारे गाँव में यारो कमाने के लिए छूटा है मजबूरन हमारा घर कमी वर्ना न कुछ भी थी हमारे गाँव में यारो नए जीवन के रंगों का भले सूखा पड़ा है पर मिलेगी प्रेम की नद्दी हमारे गाँव में यारो छिपाकर मान मर्यादा रखे घूँघट के आड़े में हैं ऐसी भी बहू बेटी हमारे गाँव में यारो बरस बीते मगर बेटे न बोले बाप के आगे है ज़िन्दा ये अदबकारी हमारे गाँव में यारो — Shivam Rathore
हैं आँखें बंद फिर भी ताश से इक्का निकालेंगे कहीं से भी मगर मंज़िल का हम रस्ता निकालेंगे अगर ख़ुशियाँ हमारी माँ के ख़ातिर हो हमें लाना कमाया अब तलक हर एक वो सिक्का निकालेंगे भले रक्खा सजाकर घर को हथियारों से उस ने पर हुनर से हम वहीं से एक गुलदस्ता निकालेंगे खुले स्कूल जो चेहरों को भी पढ़ना सिखाए तो पुराना इक दफ़ा फिर हम वही बस्ता निकालेंगे अधूरा है तुम्हारा तन कमी बस दिल की है इस में कहोगे तो हमारे तन से ये पुर्जा निकालेंगे बनेगा घर मुहब्बत का जो टूटेगा न जीवन भर ये होगा तब अगर मिल कर सही नक़्शा निकालेंगे — Shivam Rathore

Nazm