"काश"

काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता

नहीं मुझ को नहीं कोई दर्द देते हर्फ़ मिटाने
न ही कोई बेरहम सी याद यादों से मिटानी है

मुझे बस फिर से जीना है तेरे मेरे उन लम्हों को
जिन्हें बीते हुए भी एक मुद्दत बीतने को है

मुझे बस फिर से सुननी है फ़ज़ूली गुफ़्तगू अपनी
जो अब भी कान के परदों में अक्सर गूँजती सी है

मुझे बस फिर से छूना है तेरे नाज़ुक से गालों को
के जिन पर आ के वो नन्ही शरारत बिखर जाती थी

काश मैं वक़्त की सुइयों को उल्टी चाल दे पाता

— Surendra Bhatia "Salil"

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