जब से ये तेरे इश्क़ का हक़दार हुआ है
जीना तेरे बीमार का आज़ार हुआ है
मुद्दत से ये आवारा परिंदे की तरह था
दिल तेरी मुहब्बत में गिरफ़्तार हुआ है
उन की तो ख़बर दफ़्न है उन की ही गली में
मुफ़लिस के लिए भी कभी अख़बार हुआ है?
होने को मेरी जान हुआ क्या नहीं लेकिन
तेरा न हुआ जो वही बेकार हुआ है
ये सोच के हर शाम उदासी में पड़े हैं
इतना तो हसीं शख़्स था बीमार हुआ है
इक मैं ही नहीं जो है यहाँ तुझ से मुतासिर
इस शहर में हर कोई तेरा यार हुआ है
— Surendra Bhatia "Salil"















