Siddharth Saaz

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    मुझसे जो मुस्कुरा के मिला हो गया उदास
    ताज़ा हवा की खिड़कियों को जंग लग गई
    Siddharth Saaz
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    कभी तो कोसते होंगे सफ़र को
    कभी जब याद करते होंगे घर को

    निकल पड़ती हैं औलादें कमाने
    परिंदे खोल ही लेते हैं पर को
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    हमने तुझ पे छोड़ दिया है
    कश्ती, दरिया, भँवर, किनारा
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    उसी वक़्त अपने क़दम मोड़ लेना
    नदी पार से जब इशारा करूँगा
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    ग़ज़ल पूरी न हो चाहे, मग़र इतनी सी ख़्वाहिश है
    मुझे इक शेर कहना है तेरे रुख़्सार की ख़ातिर
    Siddharth Saaz
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    `तू मेरे पास आ कर बैठ मुझसे बात कर ऐ दोस्त
    ये मुमकिन है कोई दरिया ख़राबों से निकल आये
    Siddharth Saaz
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    एक नया आशिक़ है उसका, जान छिड़कता है उसपर
    मुझको डर है वो भी इक दिन मयखाने से निकलेगा
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    तेरे होंठो से गर इक काम लेना हो
    तेरे होंठो से हम बस इक दुआ लेंगे
    Siddharth Saaz
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    जबकि मैंने इश्क़ में मरने का वादा कर लिया
    तब लगा मुझको कि मैंने इश्क़ ज़्यादा कर लिया
    Siddharth Saaz
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    घड़ी पर हाथ रख लेता था मैं, जब
    तू मुझको देखता था मुस्कुरा के
    Siddharth Saaz
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