समझ आया मोहब्बत में उदासी है
तुम्हारी क्यूँ इबादत में उदासी है
तुम्हारी क्यूँ इबादत में उदासी है
हमारे ही क़बीले से ये निकली है
हमारी ही रिवायत में उदासी है
तुझे अच्छा नहीं लगता ये माना चल
तेरी फिर क्यूँ शिकायत में उदासी है
अलग खाते अलग जीते अलग हो अब
अभी फिर क्यूँ तबीअत में उदासी है
नज़र उस की में रहना भी है डरना भी
तो क्या उस की इजाज़त में उदासी है
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मुझे नाराज़ होने का यूँ हक़ तो अब नहीं शायद
उसे मुझ से कहीं प्यारी अना अपनी ही है यारों
उसे मुझ से कहीं प्यारी अना अपनी ही है यारों
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करो जब बे-वफ़ाई तो न उसपर तुम
ज़रा सा मुस्कुरा दो और काफ़ी है
ज़रा सा मुस्कुरा दो और काफ़ी है
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मुझे अब फिर बुरी लगने लगी बातें
मुझे फिर इश्क़ से नफ़रत हुई होगी
मुझे फिर इश्क़ से नफ़रत हुई होगी
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