समझ आया मोहब्बत में उदासी है
तुम्हारी क्यूँ इबादत में उदासी है
हमारे ही क़बीले से ये निकली है
हमारी ही रिवायत में उदासी है
तुझे अच्छा नहीं लगता ये माना चल
तेरी फिर क्यूँ शिकायत में उदासी है
अलग खाते अलग जीते अलग हो अब
अभी फिर क्यूँ तबीअत में उदासी है
नज़र उस की में रहना भी है डरना भी
तो क्या उस की इजाज़त में उदासी है
— Amanpreet singh















