बोल सकता नहीं इतना टूटा हूँ मैं
आसमाँ को यूँ ही थोड़ी तकता हूँ मैं
अब जहाँ पर कोई भी नहीं रहता है
लापता से उसी घर का नक़्शा हूँ मैं
आज जंगल में बस बात होगी मेरी
पेड़ काटे बिना शहर लौटा हूँ मैं
तितलियाँ पूछती रहती हैं मुझ से ये
फूलों को तोड़ कर कैसे हँसता हूँ मैं
इक वही शख़्स मुझ को बड़ा याद है
इक वही दाग़ हर रोज़ धोता हूँ मैं
— Amanpreet singh















