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पायाब जानकर कुछ हैं सोच में पड़े जो
हर वक़्त थे पढ़े ये भूगोल की किताबें
हर वक़्त थे पढ़े ये भूगोल की किताबें
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हाल कोई तो मिरा भी पूछ ले एक मर्तबा
झूठ कैसे बोलना है सीखना मैं चाहता
झूठ कैसे बोलना है सीखना मैं चाहता
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सारे अधूरे हैं तिरे इक हुस्न के वो सामने
तू जो दिखे तो रात में भी भोर हो जाए मिरा
तू जो दिखे तो रात में भी भोर हो जाए मिरा
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चला आया मकाँ ख़ाली करा कर मैं
जले हैं आशियाने बे-ज़बाँ के भी
जले हैं आशियाने बे-ज़बाँ के भी
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