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Top 10 of
Praveen Sharma SHAJAR
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Praveen Sharma SHAJAR
“उम्मीद “
कैसे तन्हाई में रोऊँ कैसे महफ़िल में हसूँ
ग़म से सूरत मिरी बर्बाद भी हो सकती है
बस यही सोच के ख़ुद को मैं सजाता हूँ रोज़
तुझ से इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है
न है गैरों से ही शिकवा न ही अपनों से सवाल
सब के सब एक तराजू पे हैं तोले मुझको
ग़म अगर आग है तो कहना जलाए मेरा दिल
ग़म समंदर है तो कहना कि डुबोले मुझको
ऐसी तन्हाई भी आती है की दिल चीख़ पड़ा
ऐसी खुशियाँ भी थीं कि जिन
में मुझे होश न था
चाहे मंजर कोई भी आए गए हों मुझ पर
मैं तुझे याद न करता ऐसा मदहोश न था
अब चला हूँ तेरी जानिब तो ये डर लगता है
तू न पहचान सकेगी मुझे तो क्या होगा
फिर उसी पल ये ख़याल आता है दिल में मेरे
अब तलक भी तेरे बगैर ही जीता रहा हूँ
अब भला कौन सा दुख है नया जो दर पर है
अब भला कैसी ख़िज़ाँ है कि जो मुरझा रहा हूँ
तू न आए न बुलाए तो कोई बात नहीं
पर बुलाये आए तो कोई बात भी हो सकती है
इतना कुछ सोच के ख़ुद को में सजाता हूँ फिर
तुझ सेे इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है
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Praveen Sharma SHAJAR
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अच्छा हुआ कि आपसे रिश्ता नहीं गया
वरना तो इस फ़िराक़ में क्या क्या नहीं गया
हर बार दिल पे मेरे क़यामत गिरी मगर
फिर भी मुहब्बतों से भरोसा नहीं गया
मैं हूँ तो दश्त मुझ
में ज़रा भी नहीं नमी
कोई मिरे करीब से प्यासा नहीं गया
हमने हक़ीकतें भी सही हैं तेरी निषाद
तुझ सेे हमारा ख़्वाब भी देखा नहीं गया
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Praveen Sharma SHAJAR
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मुझको जीने का हौसला दीजे
वरना रिश्तों का फ़ाएदा क्या है
Praveen Sharma SHAJAR
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'इश्क़ में पागल हो जाना भी फ़न है दोस्त
और ये दुख की बात है हम फ़नकार नहीं
Praveen Sharma SHAJAR
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बदन बदन सफ़र किया मुहब्बतों की आस में
घुटन घुटन बसर किया मुहब्बतों की आस में
मुझे ख़बर नहीं कि 'इश्क़ रूह का है क्या बला
बदन लहू से तर किया मुहब्बतों की आस में
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Praveen Sharma SHAJAR
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“ख़याल”
मैं ये रोज़ सोचता हूँ
तुमको फ़ोन करूँँ लेकिन
एक ख़याल सताता है
तुम से बात जो कर लूँगा
मन हलका हो जाएगा
फिर तुम सादा दिल भी हो
मुझको माफ़ भी कर दोगी
फिर हम बात करेंगे रोज़
मैं उम्मीद लगा लूँगा
फिर इक दिन ऐसा होगा
तुम उस दोस्त के पास में होगी
मैं तन्हा रह जाऊँगा
फिर मुझको रोना होगा
आख़िर में जब रोना है
तो मैंने ये सोचा है
तुमको फ़ोन भी क्यूँँ करना
मैं यूँँ ही रो लेता हूँ
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Praveen Sharma SHAJAR
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अपना लिक्खा और सभी का छोड़ दिया
पल भर लिक्खा और सदी का छोड दिया
जिन पैरों में कुचल के जन्नत मिलनी थी
हमने उन पैरों का रस्ता छोड़ दिया
आज कि सर पर घर की जिम्मेदारी थी
हमने उस डोली का रस्ता छोड़ दिया
हमको सारा शहर तसल्ली देता है
हमने अपने गाँव का घर क्या छोड़ दिया
एक दिन ग़ज़ल लिखी थी दफ़्तर लेट हुआ
फिर क्या बस दफ़्तर का रस्ता छोड़ दिया
तेरे अख़बारों की ख़बरें झूठी हैं
हमने तेरा शहर तो कब का छोड़ दिया
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Praveen Sharma SHAJAR
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माना कि रात तारों को गिनना अजीब है
लेकिन किसी को नींद न आए तो क्या करे
Praveen Sharma SHAJAR
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मैंने इनको जिया ही नहीं था, मैं तो ग़ज़लें फ़क़त पढ़ रहा था
हाथ में डायरी ध्यान तुम पर, देख कर भी ग़लत पढ़ रहा था
Praveen Sharma SHAJAR
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तू ग़लत है मुझको ये शक नहीं है, अरे नहीं है, सफ़ाई मत दे
यक़ीं था मुझको, तू एक दिन तो यही करेगा, सफ़ाई मत दे
मेरा मामला तेरे ही हाथों अदालतों से बरी हुआ था
मैं जानता हूँ तू कितना अच्छा वकालती है, सफ़ाई मत दे
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Praveen Sharma SHAJAR
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