“उम्मीद “
कैसे तन्हाई में रोऊँ कैसे महफ़िल में हसूँ
ग़म से सूरत मिरी बर्बाद भी हो सकती है
बस यही सोच के ख़ुद को मैं सजाता हूँ रोज़
तुझ से इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है
न है गैरों से ही शिकवा न ही अपनों से सवाल
सब के सब एक तराजू पे हैं तोले मुझ को
ग़म अगर आग है तो कहना जलाए मेरा दिल
ग़म समुंदर है तो कहना कि डुबोले मुझ को
ऐसी तन्हाई भी आती है की दिल चीख़ पड़ा
ऐसी ख़ुशियाँ भी थीं कि जिन
में मुझे होश न था
चाहे मंज़र कोई भी आए गए हों मुझ पर
मैं तुझे याद न करता ऐसा मदहोश न था
अब चला हूँ तेरी जानिब तो ये डर लगता है
तू न पहचान सकेगी मुझे तो क्या होगा
फिर उसी पल ये ख़याल आता है दिल में मेरे
अब तलक भी तेरे बगैर ही जीता रहा हूँ
अब भला कौन सा दुख है नया जो दर पर है
अब भला कैसी ख़िज़ाँ है कि जो मुरझा रहा हूँ
तू न आए न बुलाए तो कोई बात नहीं
पर बुलाये आए तो कोई बात भी हो सकती है
इतना कुछ सोच के ख़ुद को में सजाता हूँ फिर
तुझ से इक रोज़ मुलाक़ात भी हो सकती है















