हमारे साथ हँसते वो हसीं लगते नज़ारे हैं
हमारी झील सी आँखों में ख़्वाबों के शिकारे हैं
हमारी झील सी आँखों में ख़्वाबों के शिकारे हैं
अभी हम से ज़रा सी बात पर रूठे सितारे हैं
कि हम ने रौशनी में चाँद की गेसू सँवारे हैं
खुले रहते हमेशा दो बटन कुर्ते के उन के जो
हमारे हाथ से लगने की ज़िद में आज सारे हैं
इजाज़त है उन्हें ख़ुद को निहारें रात दिन इन
में
बहुत बेचैन आईने निगाहों के हमारे हैं
किसी की याद में जलते हुए वो हम से टकराए
हमारे रेशमी आँचल से तब उलझे शरारे हैं
लिपटती जा रही ये बेल इक सूखे शजर से जो
दुबारा उस शजर के सब्ज़ होने के इशारे हैं
हमारी नम निगाहों से बुझेगी प्यास कैसे अब
समुंदर से ज़ियादा तो हमारे अश्क खारे हैं
हमारे साथ खेलेंगे नहीं हारे वो गर हम से
तभी तो ऐ सखी राज़ी ख़ुशी हम दाँव हारे हैं
हमें कुछ देर ठहरा सा लगा पल इक ख़ुशी का पर
ख़ुशी ठहरे न ग़म ऐसे समय के तेज़ धारे हैं
हरे हैं ज़ख़्म सारे सब्र थोड़ा और कर ले दिल
हवा-ए-हिज्र ने कुछ ख़ुश्क पत्ते ही उतारे हैं
बुरे इस वक़्त ने अच्छा बहुत अच्छा किया ये सब
मुखौटे झूठ के अपनों के चेहरों से उतारे हैं
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नशे में काँपते दिखे तेरे ये हाथ तो लगा
मकान है बुलन्द और काँपती असास है
तू साथ गर ख़ुशी ख़ुशी न चल सके तो लौट जा
मुझे तेरी ख़ुशी तेरा सुकून सब से ख़ास है
यूँ तैश में जो फूल तोड़ के गया है दूर तू
तभी से मौसम-ए-बहार बाग़ में उदास है
जो ये हवा गिरा रही है टहनियों से पत्तियाँ
बयार बिन तेरे दुखी है ख़ुश्क बद-हवा से है
तेरे दिए हुए जो फूल ख़्वाब में बिखर गए
खुली जो आँख पास तू नहीं तो सिर्फ़ यास है
तमाम रात वहम में ही जाग के गुज़ार दी
मेरे तू साथ है नहीं मगर तू आस पास है
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तमाम बातें मेरी जो सुन के अगर ज़ियादा तू चुप रहेगा
सुकूत मैं ने रखा लबों पे तो बे-तहाशा तू चुप रहेगा
सुकूत मैं ने रखा लबों पे तो बे-तहाशा तू चुप रहेगा
ये सब्र मेरा है टूटने को तू और मेरा न इम्तिहाँ ले
जवाब दे कुछ क़सम तुझे है बता दे कितना तू चुप रहेगा
मिज़ाज तेरा ये सूफ़ियाना अगर मुझे भी जो रास आए
फिरूँ मैं हो के तेरी ही जैसी तू क्या कहेगा तू चुप रहेगा
बहे न दरिया न सब्ज़ शाखें दरख़्त सूने उजाड़ जंगल
बता मुझे अब यूँ छोड़ तन्हा हयात-अफ़्ज़ा तू चुप रहेगा
हज़ार आफ़त मेरे है सिर पर हज़ार तोहमत वफ़ा पे मेरी
सिमटने को है वजूद मेरा मेरे ख़ुदा क्या तू चुप रहेगा
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सुनो मोहब्बत इक बीमारी है
इकतरफ़ा हो तो बेगारी है
इकतरफ़ा हो तो बेगारी है
इक तेरी ही तो हाँ की ख़ातिर
हम ने जीती बाज़ी हारी है
कहते ख़ुद से तो समझे हम भी
हर इक बात तेरी अख़बारी है
अब तेरी ही यादों से भर ली
हम ने भी दिल की अलमारी है
सोए तुम जाने किस उलझन में
पल-पल रात गुज़रती भारी है
हम झगड़े रूठें इक दूजे से
कभी न टूटे पक्की यारी है
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ढलती शा
में तन्हा साहिल और समुंदर
में तन्हा साहिल और समुंदर
कोई लहर न ठहरे पास किनारे आ कर
पार जिगर के तीर नज़र जब होते अक्सर
ऐसे घाइल कभी न होते जल्दी बेहतर
मैं हर पल तेरी यादों में रोती दिलबर
ख़ाली होता नहीं मेरी आँखों का कौसर
लिखने वाले कैसा तुम ने लिखा मुकद्दर
तुम ने ही क्यूँ काट दिए मुझ पंछी के पर
न रास्ता भूले हम न हम ने खाई ठोकर
पीछे हम चलते थे आगे आगे रहबर
बादल बरसे ख़ुशी से या फिर हो के मुज़्तर
होंगी दश्त-ओ-सहरा में बारिशें मुयस्सर
हम को इक ही पल में छोड़ गया तन्हा वो
काटी रातें जिस की ख़ातिर हम ने जगकर
Read Fullपार जिगर के तीर नज़र जब होते अक्सर
ऐसे घाइल कभी न होते जल्दी बेहतर
मैं हर पल तेरी यादों में रोती दिलबर
ख़ाली होता नहीं मेरी आँखों का कौसर
लिखने वाले कैसा तुम ने लिखा मुकद्दर
तुम ने ही क्यूँ काट दिए मुझ पंछी के पर
न रास्ता भूले हम न हम ने खाई ठोकर
पीछे हम चलते थे आगे आगे रहबर
बादल बरसे ख़ुशी से या फिर हो के मुज़्तर
होंगी दश्त-ओ-सहरा में बारिशें मुयस्सर
हम को इक ही पल में छोड़ गया तन्हा वो
काटी रातें जिस की ख़ातिर हम ने जगकर
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अगर ख़ुदा बनते पत्थर को तराश के
फिर तो हर इंसान ख़ुदा का ख़ुदा होता
फिर तो हर इंसान ख़ुदा का ख़ुदा होता
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हाँ वो तो शाइ'र है , और सखी मैं
मैं हूँ नज़्म उसी की एक अधूरी
जो कई बरसों पहले लिखते-लिखते
छूट गई उन हाथों से ही अधूरी
जिन पत्थर से हाथों को नरमी से
कुछ और नई नज़्मों को बुनना था
उलझन के धागों को फिर सुलझा के
और नए लफ़्ज़ न सिर्फ़ पिरोने थे
उन को पहले से ज़्यादा तराशना था
उन को और भी ज़्यादा निखारना था
लेकिन मैं जो उस की पहली नज़्म हूँ
क्यूँ आज अधूरेपन से बोझिल हूँ
मुझ से नज़रे मिलते ही उस ने तो
बैचेनी से भी पन्ने पलटे हैं
पर इक हाथ रहा उस का मुझ पर
जो बोझ नई नज़्मों का संभाले था
वो ठहरता साथ एक लम्हा मेरे
तो शायद मेरा हो कर रह जाता
यूँ ही अक्सर पहली मोहब्बत सी
पहली नज़्म अधूरी रह जाती है
क्योंकि कभी वो ख़ुद मुझ को कह न सका
उस ने मुझ को सिर्फ़ लिखा है अब तक
वो कह दे तो मैं पूरी हो जाऊँ
उस की आवाज़ से ज़िंदा हो जाऊँ
उसे पता है मैं पूरी होते ही
ख़ुद से उस को पूरा कर दूँगी
और अधूरी हो जाऊँगी फिर से
वो भी अधूरा रह जाएगा फिर से
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जो कई बरसों पहले लिखते-लिखते
छूट गई उन हाथों से ही अधूरी
जिन पत्थर से हाथों को नरमी से
कुछ और नई नज़्मों को बुनना था
उलझन के धागों को फिर सुलझा के
और नए लफ़्ज़ न सिर्फ़ पिरोने थे
उन को पहले से ज़्यादा तराशना था
उन को और भी ज़्यादा निखारना था
लेकिन मैं जो उस की पहली नज़्म हूँ
क्यूँ आज अधूरेपन से बोझिल हूँ
मुझ से नज़रे मिलते ही उस ने तो
बैचेनी से भी पन्ने पलटे हैं
पर इक हाथ रहा उस का मुझ पर
जो बोझ नई नज़्मों का संभाले था
वो ठहरता साथ एक लम्हा मेरे
तो शायद मेरा हो कर रह जाता
यूँ ही अक्सर पहली मोहब्बत सी
पहली नज़्म अधूरी रह जाती है
क्योंकि कभी वो ख़ुद मुझ को कह न सका
उस ने मुझ को सिर्फ़ लिखा है अब तक
वो कह दे तो मैं पूरी हो जाऊँ
उस की आवाज़ से ज़िंदा हो जाऊँ
उसे पता है मैं पूरी होते ही
ख़ुद से उस को पूरा कर दूँगी
और अधूरी हो जाऊँगी फिर से
वो भी अधूरा रह जाएगा फिर से
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बेचैन थी लहरें समुंदर की अभी तूफ़ान से
हम देखते थे दूर साहिल पर खड़े हैरान से
हम देखते थे दूर साहिल पर खड़े हैरान से
साँसे महकती हैं अगर मैं यूँ मिलूँ उस से कभी
जैसे हवा मिल के महकती ही रहे लोबान से
मैं राह का पत्थर बनी वो देव मूरत हो गया
कुछ भी नहीं है फ़र्क़ दोनों रह गए बेजान से
दिल एक तरफ़ा इश्क़ की मुश्किल समझता ही नहीं
हैं रास्ते जो इश्क़ के होते नहीं आसान से
मौसम बदलते ही उड़े जो शाख़ से वो हैं कहाँ
लौटे नहीं वापस परिन्दें , हैं शज़र वीरान से
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