Meenakshi Masoom

Meenakshi Masoom

@meenakshi120k

Meenakshi Masoom shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Meenakshi Masoom's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

पुर-सुकूँ होते हैं दुआ कर के हम ने देखा है तजरबा कर के — Meenakshi Masoom
फूल की आग़ोश में मदहोश जब तितली रहे फूल चाहे वक़्त थम जाए हवा धीमी रहे — Meenakshi Masoom
वो मेरी पाज़ेब की झंकार से बीमार है तो शिफ़ा ता-उम्र उस को अब मिलेगी ही नहीं — Meenakshi Masoom
रहे सीने से लिपटा शॉल पहरेदार बन उन के उसी से आज झुमकों के उलझने के इरादे हैं — Meenakshi Masoom
अगर ख़ुदा बनते पत्थर को तराश के फिर तो हर इंसान ख़ुदा का ख़ुदा होता — Meenakshi Masoom
दुख है कि वो पूछे नहीं यूँँ हाल भी मुझ सेे कभी पूछे कभी जो हाल आँखों की तरफ़ देखे नहीं — Meenakshi Masoom
जब से तुम सौदागर बन बैठे हो चमकीले तारों के तब से मैं भी सर्दी की शामों सी जल्दी ढल जाती हूँ — Meenakshi Masoom
इश्क़ में दिल मश्वरा न कर यूँ अना से रस्म-ए-वफ़ा की ये जानकार नहीं है — Meenakshi Masoom
अपनी उदास शक्ल छुपाने के वास्ते हँसता हुआ हसीन मुखौटा पहन लिया — Meenakshi Masoom
अदावत हाथ के पत्थर ने शीशे से निभानी है मेरे ही अक्स को मुझ से ज़रा सी बद-गुमानी है — Meenakshi Masoom
ये सिगरेट से तेरा जो हाथ बार-बार जला है अपने हाथों मेरा महताब दाग़दार हुआ है — Meenakshi Masoom
साहिल से जिन्हें लहरें ले जाती बहा कर है उन रेत से ख़्वाबों का घरौंदा नहीं बनना — Meenakshi Masoom
तेरी आँखों की जो ख़ुमारी है करती मेरी नफ़स-शुमारी है — Meenakshi Masoom

Ghazal

फ़कत बरसात में दरिया को सहरा से गुज़रना है परिंदों को यहाँ फिर साल भर प्यासा ही मरना है मुहब्बत में किसी हद तक सयानी हो गई हूँ मैं मुझे मालूम है अब क्यूँ कहाँ कैसे मुकरना है नसीम-ए-सुब्ह सिर अपना तेरे शाने पे रख लूँ तो सितमगर वक़्त ने ऐसे में तेज़ी से गुज़रना है कभी ख़्वाब-ए-सहर लिपटी रहूँ सीने से मैं तेरे बदल कर करवटें तू ने मुझे बेदार करना है ज़रूरी यूँँ है तेरे नाम को लिखना हथेली पर कि तेरे नाम से ही रंग मेहँदी का निखरना है मुसलसल चाहतें बरसा के अब तेरे लबों ने ही मुहब्बत से मेरे बंजर लबों को सब्ज़ करना है मुझे इक साँस भी तुझ सेे अलग रह कर नहीं लेनी तेरे ही साथ रहना साथ जीना साथ मरना है — Meenakshi Masoom
क्या बताऊँ क्यूँ मेरी रातें सँवरती ही नहीं दूरियाँ घटती नहीं नज़दीकियाँ बढ़ती नहीं मैं अगर उस के बिरह की आग में तपती नहीं तो मेरी इस रूह की रंगत निखरती ही नहीं इक झलक से उस की मेरा हाल यूँँ बेहाल है साँस भी आती नहीं ये जान भी जाती नहीं उस समुंदर से मिलन की आरज़ू कैसे करूँँ प्यास जिस की एक दरिया से कभी बुझती नहीं बे-झिझक हो कर मेरे ख़ातिर बरसता वो रहा और मैं शर्म-ओ-हया ओढ़े रही भीगी नहीं बादलों की क़ैद में था चाँद उस का रात भर इस लिए आँगन में उस के चाँदनी बिखरी नहीं ख़्वाहिशों के आसमाँ पर ज़ीस्त करते हैं बसर आशिक़ों के पाँव के नीचे ज़मीं होती नहीं — Meenakshi Masoom
तिरे सिवा नहीं किसी का भी ख़याल क्या करूँँ तिरे ही हाल से मिला रही मैं हाल क्या करूँँ तू अपने हाथ से बिखेर के सँवार दे या फिर समेट लूँ मैं बे-दिली से अपने बाल क्या करूँँ ये ना-समझ जहाँ इसे समझ रहा है दाग़ क्यूँ चढ़ा है मुझ पे प्यार का जो रंग लाल क्या करूँँ मैं अपने हाथ से तुझे ज़रा सा रंग दूँ या फिर लगा दूँ गाल से मैं गाल पर गुलाल क्या करूँँ तिरे ही दस्तरस की चाह में तिरी नज़र से ही मैं बाण भिद मृगी सी हो गई निढाल क्या करूँँ फ़ज़ा है सर्द से भी सर्द हैं हया के फ़ासले ये रात हिज्र की है चाँद पुर-जमाल क्या करूँँ हया ने एक रोज़ इश्क़ में चुने थे फ़ासले उसी का आज हो रहा बहुत मलाल क्या करूँँ — Meenakshi Masoom
ता-क़यामत इश्क़ की जादूगरी जारी रहे उस की सूरत इन निगाहों में सदा ठहरी रहे ज़िंदगी भर पास उस के मैं रहूँ कुछ इस तरह जिस तरह से इक हिरन के पास कस्तूरी रहे जिस्म पर पोशाक सादी मैं पहन लूँगी मगर शॉल पर उस के मेरे हाथों की गुलकारी रहे उस के बिन भारी लगे दिन की गुज़रती हर घड़ी और तन्हा रात मेरी जान की बैरी रहे हाए पूरे चाँद की ये रात क्यूँ उस के बिना चाँदनी तन मन जलाने के लिए बिखरी रहे शम्स मेरे साथ डूबे वादियों में प्यार की इस तमन्ना में सलोनी शाम सिंदूरी रहे ये मुहब्बत से भरी उस की नज़र मुझ पर सदा रात में शबनम सी दिन में धूप सी बिखरी रहे — Meenakshi Masoom
कैसे कहूँ तुम से कि अपनों ने रुलाया है बहुत मुझ पर लगा के तोहमतें ये दिल दुखाया है बहुत हर ज़ख़्म दिन पर दिन हुआ है और भी नासूर यूँँ अपनों की इज़्ज़त के लिए इनको छुपाया है बहुत मत पूछ कब कैसे दुखा दिल और भी ज़्यादा मेरा मेरे दुखों पर कोई अपना मुस्कुराया है बहुत तूफ़ान अपने ज़ेहन के ले काग़ज़ों पर रात दिन लिख लिख के मैं ने नज़्म ग़ज़लों को मिटाया है बहुत कितने महीने साल बीते चैन से सोई नहीं मुझ को बुरी यादों ने ख़्वाबों में डराया है बहुत मेरे लबों ने गर उधारी में तबस्सुम जो लिया तो क़र्ज़ इन आँखों ने रो रो कर चुकाया है बहुत सब सेे हसीं इक फूल गुलशन से नदारद हो गया इस हादसे पर बाग़बाँ ने दुख जताया है बहुत — Meenakshi Masoom

Nazm

"तुझ सेे मिल कर" तुझ सेे मिल कर एक दफ़ा ही बात हुई फिर इस दिल में बेचैनी दिन रात हुई इस पागल दिल की फ़रमाइश है तेरा चेहरा हाथों में भरने की ख़्वाहिश है ख़्वाबों में तेरा चेहरा आए हाथों से रेत की तरह फिसला जाए जाते जाते मेरे होंठों पर ठहरे तू सारे के सारे अल्फ़ाज़ ले गया खनक खनक कर मुझ सेे तेरी बातें करती थीं उन चूड़ियों की भी तू आवाज़ ले गया इक मुद्दत से तुझे नहीं देखा भला मुझे ख़ुद का भी कैसे होश रहे फिर से तेरी आहट सुनने को अब मेरी पायल बिल्कुल ख़ामोश रहे तेरे हाथों रोज़ सुलझने की चाहतें लिए मेरी ज़ुल्फ़ें उलझी उलझी रहती हैं तू क्या जाने कि मौसम-ए-सर्मा में अब कैसे मेरी साँसें तन्हा सर्द हवाएँ सहती हैं ग़ुस्से में तेरे नाम की मेहॅंदी जब मैं ने अपने कोरे आँचल पर पोंछी इस बात से ख़फ़ा मेरे उस आँचल ने ख़ुद पर गहरा दाग़ लिया तेरे आने की झूठी ख़बरों से उकता कर इन कानों ने झुमकों से वैराग लिया तेरे कपड़ों पर सिर्फ़ इस्तरी करने के ही कितने ख़्वाब लिए अपनी इन आँखों में तुझ को क्या मालूम कि मैं अपने कितने आँचल कितनी बार जला बैठी याद तुझे रखने की कोशिश में ख़ुद को पूरी तरह भुला बैठी पता नहीं कब तेरे काले कुर्ते ने मेरी आँखों से काजल लूटा पता नहीं बरसात मुसलसल क्यूँ रहती पता नहीं कैसे आँखों का दिल टूटा मैं ख़ुद सिल दूँगी अपनी साँसों के धागों से अगर उलझ कर मेरी ज़ुल्फ़ों से कभी बटन तेरे कुर्ते का जो टूटा वक़्त तेरी आस्तीन की सिलवटें लिए मेरे चेहरे से कब गुज़रा पता नहीं कई बहारें मुझ सेे हो कर गुज़रीं यार मगर मुरझाया जो दिल का फूल दुबारा खिला नहीं तू आ कर देख तो सही तेरे इंतिज़ार में अपनी उम्र जवानी की बुनते बुनते मैं ने और किया ही क्या अपने लिए लिबास बुढ़ापे का अपने हाथों से तैयार किया — Meenakshi Masoom
“अधूरी नज़्म” हाँ वो तो शाइ'र है , और सखी मैं मैं हूँ नज़्म उसी की एक अधूरी जो कई बरसों पहले लिखते-लिखते छूट गई उन हाथों से ही अधूरी जिन पत्थर से हाथों को नरमी से कुछ और नई नज़्मों को बुनना था उलझन के धागों को फिर सुलझा के और नए लफ़्ज़ न सिर्फ़ पिरोने थे उन को पहले से ज़्यादा तराशना था उन को और भी ज़्यादा निखारना था लेकिन मैं जो उस की पहली नज़्म हूँ क्यूँ आज अधूरेपन से बोझिल हूँ मुझ सेे नज़रे मिलते ही उस ने तो बैचेनी से भी पन्ने पलटे हैं पर इक हाथ रहा उस का मुझ पर जो बोझ नई नज़्मों का संभाले था वो ठहरता साथ एक लम्हा मेरे तो शायद मेरा हो कर रह जाता यूँँ ही अक्सर पहली मोहब्बत सी पहली नज़्म अधूरी रह जाती है क्योंकि कभी वो ख़ुद मुझ को कह न सका उस ने मुझ को सिर्फ़ लिखा है अब तक वो कह दे तो मैं पूरी हो जाऊँ उस की आवाज़ से ज़िंदा हो जाऊँ उसे पता है मैं पूरी होते ही ख़ुद से उस को पूरा कर दूँगी और अधूरी हो जाऊँगी फिर से वो भी अधूरा रह जाएगा फिर से — Meenakshi Masoom