जब छूट गई हाथ से शमशीर हमारी
तब टूट गई ज़ीस्त की ज़ंजीर हमारी
तक़दीर में रब उस की भरे रंग ख़ुशी के
दिन रात बनाता है जो तस्वीर हमारी
तकलीफ़ सिवा रब के भला किस को दिखाते
इंसाँ की समझ से थी परे पीर हमारी
ता-उम्र वो नाराज़ रहे क्योंकि समय पर
उन को न मिली सुल्ह की तहरीर हमारी
राँझे सा मुक़द्दर जो हुआ इश्क़ में उन का
तो मिलने लगी हीर से तक़दीर हमारी
— Meenakshi Masoom















