कमी को उस की मिरी रफ़्तगी ने काट दिया
पहाड़ ग़म का ये बादा-कशी ने काट दिया
घना दरख़्त मोहब्बत का सहन में था मिरे
मगर वो जिस ने लगाया उसी ने काट दिया
बिछड़ के उस से सफ़र ज़िंदगी का था मुश्किल
ये रास्ता मिरी आवारगी ने काट दिया
हुनर था शौक़ भी ऊँची उड़ान का लेकिन
मिरे परों को मिरी बेबसी ने काट दिया
उसे मैं अपनी तरफ़ खींचने ही वाली थी
तभी पतंग का माँझा किसी ने काट दिया
— Meenakshi Masoom















