तिरे सिवा नहीं किसी का भी ख़याल क्या करूँँ
तिरे ही हाल से मिला रही मैं हाल क्या करूँ
तू अपने हाथ से बिखेर के सँवार दे या फिर
समेट लूँ मैं बे-दिली से अपने बाल क्या करूँ
ये ना-समझ जहाँ इसे समझ रहा है दाग़ क्यूँ
चढ़ा है मुझ पे प्यार का जो रंग लाल क्या करूँ
मैं अपने हाथ से तुझे ज़रा सा रंग दूँ या फिर
लगा दूँ गाल से मैं गाल पर गुलाल क्या करूँ
तिरे ही दस्तरस की चाह में तिरी नज़र से ही
मैं बाण भिद मृगी सी हो गई निढाल क्या करूँ
फ़ज़ा है सर्द से भी सर्द हैं हया के फ़ासले
ये रात हिज्र की है चाँद पुर-जमाल क्या करूँ
हया ने एक रोज़ इश्क़ में चुने थे फ़ासले
उसी का आज हो रहा बहुत मलाल क्या करूँ
— Meenakshi Masoom















