दो घड़ी आप का रूठना क्या हुआ
दिल की बेचैनियों में इज़ाफ़ा हुआ
साथ जब अपने लाई हवा अब्र को
तब कहीं जा के मौसम सुहाना हुआ
मैं नहीं पढ़ सकी लफ़्ज़ सब मिट गए
आप का ख़त मिला वो भी भीगा हुआ
रौशनी बढ़ गई रख दिया आपने
काँच के सामने दीप जलता हुआ
हाथ चुप-चाप थामा मेरा आपने
गिर पड़ा एक कंगन खनकता हुआ
— Meenakshi Masoom















