फ़कत बरसात में दरिया को सहरा से गुज़रना है
परिन्दों को यहाँ फिर साल भर प्यासा ही मरना है
मुहब्बत में किसी हद तक सयानी हो गई हूँ मैं
मुझे मालूम है अब क्यों कहाँ कैसे मुकरना है
नसीम-ए-सुब्ह सिर अपना तेरे शाने पे रख लूँ तो
सितमगर वक़्त ने ऐसे में तेज़ी से गुज़रना है
कभी ख़्वाब-ए-सहर लिपटी रहूँ सीने से मैं तेरे
बदलकर करवटें तूने मुझे बेदार करना है
ज़रूरी यूँ है तेरे नाम को लिखना हथेली पर
कि तेरे नाम से ही रंग मेहँदी का निखरना है
मुसलसल चाहतें बरसा के अब तेरे लबों ने ही
मुहब्बत से मेरे बंजर लबों को सब्ज़ करना है
मुझे इक साँस भी तुझसे अलग रहकर नहीं लेनी
तेरे ही साथ रहना साथ जीना साथ मरना है
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