"तुझ सेे मिल कर"
तुझ से मिल कर एक दफ़ा ही बात हुई
फिर इस दिल में बेचैनी दिन रात हुई
इस पागल दिल की फ़रमाइश है
तेरा चेहरा हाथों में भरने की ख़्वाहिश है
ख़्वाबों में तेरा चेहरा आए
हाथों से रेत की तरह फिसला जाए
जाते जाते मेरे होंठों पर ठहरे
तू सारे के सारे अल्फ़ाज़ ले गया
खनक खनक कर मुझ से तेरी बातें करती थीं
उन चूड़ियों की भी तू आवाज़ ले गया
इक मुद्दत से तुझे नहीं देखा
भला मुझे ख़ुद का भी कैसे होश रहे
फिर से तेरी आहट सुनने को
अब मेरी पायल बिल्कुल ख़ामोश रहे
तेरे हाथों रोज़ सुलझने की चाहतें लिए
मेरी ज़ुल्फ़ें उलझी उलझी रहती हैं
तू क्या जाने कि मौसम-ए-सर्मा में अब कैसे
मेरी साँसें तन्हा सर्द हवाएँ सहती हैं
ग़ुस्से में तेरे नाम की मेहॅंदी जब मैं ने
अपने कोरे आँचल पर पोंछी
इस बात से ख़फ़ा मेरे उस आँचल ने
ख़ुद पर गहरा दाग़ लिया
तेरे आने की झूठी ख़बरों से उकता कर
इन कानों ने झुमकों से वैराग लिया
तेरे कपड़ों पर सिर्फ़ इस्तरी करने के ही
कितने ख़्वाब लिए अपनी इन आँखों में
तुझ को क्या मालूम कि मैं अपने
कितने आँचल कितनी बार जला बैठी
याद तुझे रखने की कोशिश में
ख़ुद को पूरी तरह भुला बैठी
पता नहीं कब तेरे काले कुर्ते ने
मेरी आँखों से काजल लूटा
पता नहीं बरसात मुसलसल क्यूँ रहती
पता नहीं कैसे आँखों का दिल टूटा
मैं ख़ुद सिल दूँगी अपनी साँसों के धागों से
अगर उलझ कर मेरी ज़ुल्फ़ों से
कभी बटन तेरे कुर्ते का जो टूटा
वक़्त तेरी आस्तीन की सिलवटें लिए
मेरे चेहरे से कब गुज़रा पता नहीं
कई बहारें मुझ से हो कर गुज़रीं यार मगर
मुरझाया जो दिल का फूल दुबारा खिला नहीं
तू आ कर देख तो सही तेरे इंतिज़ार में
अपनी उम्र जवानी की बुनते बुनते
मैं ने और किया ही क्या
अपने लिए लिबास बुढ़ापे का
अपने हाथों से तैयार किया















