तुझ सेे मिरी जाँ हम-दिली होने लगी
मेरी मुकम्मल ज़िन्दगी होने लगी
तेरी नज़र जब मरहमी होने लगी
नासूर ज़ख़्मों में कमी होने लगी
तू साथ बारिश के बहाने जो रुका
तो तेज़ धड़कन मुल्तवी होने लगी
ये हिज्र तेरे लम्स से जलने लगा
तो ख़ाक मेरी बेकली होने लगी
उलझी मिरी बेजान हर इक ज़ुल्फ़ को
तू ने छुआ तो रेशमी होने लगी
भर कर मुझे बाँहों में चूमा प्यार से
तो रूह तक पाकीज़गी होने लगी
ऐ राहत-ए-जाँ देख तेरे इश्क़ में
'मासूम' बिल्कुल बावली होने लगी
— Meenakshi Masoom















