मेरे क़रीब आ के न मुझ सेे सवाल कर
आसान ज़िन्दगी का न जीना मुहाल कर
ख़ुशबू तेरी हवा में न बिखरे ख़याल कर
साँसों में घोल मेरी इन्हें तू सँभाल कर
कस कर गले से आज दुबारा लगा मुझे
ख़ामोश धड़कनें तू दुबारा बहाल कर
प्यासी ज़मीन हूँ मैं तू बेचैन सा फ़लक
छू कर मुझे जी भर के कभी तो निहाल कर
आती हूँ तुझ से रोज़ मुलाक़ात के लिए
मैं पायलें उतार कर आँचल सँभाल कर
सारे चराग़ तेज़ हवा ने बुझा दिए
फिर से इन्हें जला के न रातें मुहाल कर
गर रू-ब-रू न आ सके तो आ के ख़्वाब में
अपनी झलक दिखा के मुझे बे-ख़याल कर
— Meenakshi Masoom















