इश्क़ में आप ज़रा मान किए बैठे हो
ख़ामख़ाँ ख़ुद को परेशान किए बैठे हो
आपसे पूछ रही एक सलौनी कोयल
आज क्यूँ दिल को बयाबान किए बैठे हो
हो ख़फ़ा मुझ से तो क्यूँ वस्ल की उन यादों का
आतिश-ए-हिज्र में लोबान किए बैठे हो
रफ़्तगी दर्द तड़प आह विरह बैचेनी
क्यूँ इन्हें इश्क़ का उनवान किए बैठे हो
मैं सदा दिल से लगाकर ही रखूँगी उस को
जो गुहर आप मुझे दान किए बैठे हो
— Meenakshi Masoom















