ज़रा सा भी हमदम सयाना नहीं
नज़र के इशारे समझता नहीं
दरख़्त-ए-यक़ीं सूख जाए अगर
तो फिर वो समरदार होता नहीं
तिरे सुरमई होंठ कैसे हुए
मिरी आँखों में आज सुर्मा नहीं
किसी और की भूल का फल मिला
ये बोया हुआ बीज मेरा नहीं
यूँ शहर-ए-तसव्वुर सँभाला तिरा
तिरे शहर में कुछ भी बदला नहीं
गुमाँ था बहुत इब्तिदा में मुझे
मुहब्बत में धोखा मिलेगा नहीं
न फैला इसे तू ख़ुदा के लिए
ये आँचल है 'मासूम' कासा नहीं
— Meenakshi Masoom














