Rehaan

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    वो एक लड़की जो मेरे नसीब में है नहीं
    उसी पे दिल फ़िदा क्यूँ बार-बार होता है
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    शिकस्त-ए-दिल है ग़म ऐसा कहीं लज़्ज़त नहीं आती
    मिले कितने भी ता'ने फिर मगर ज़िल्लत नहीं आती

    गुमाँ है हुस्न पे उस को चढ़ा हमपे ख़ुमार-ए-इश्क़
    उसे उल्फ़त नहीं आती हमें ग़ैरत नहीं आती
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    इस क़दर हिज्र में बीमार हुआ इक लड़का
    इश्क़ के आगे यूँ लाचार हुआ इक लड़का

    सदक़े जिन आँखों के सज्दों में उतारे थे कभी
    अब उन्हीं नज़रों में बेकार हुआ इक लड़का
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    ज़रा पहचान तू मुझ को तेरे दिल में समाया हूँ
    मैं दीवाना हूँ तेरा ही तुझी को लेने आया हूँ

    मोहब्बत की अदाओं से नहीं वाक़िफ़ है तू जानाँ
    मैं ख़ुद को भूल बैठा पर न तुझ को भूल पाया हूँ
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    यहाँ हर रात जगना है यहाँ हर रात रोना है
    ये दिल मायूस है फिर भी मगन चेहरे से होना है

    तेरे जाने से बदले हैं मेरे जीवन में मौसम यूँ
    कि बरसातें तो फीकी हैं मगर पतझड़ सलोना है
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    फिर किसी को आ रहा यहाँ ख़याल इश्क़ का
    कोई कब से जी रहा लिए मलाल इश्क़ का

    जल रहा है दिल कहीं कहीं पे उठ रहा धुआँ
    हर तरफ़ ही है मचा हुआ बवाल इश्क़ का
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    कभी त्योहारों का बनके कोई हफ़्ता चली आना
    सफ़र हो ख़त्म तुमपे बनके वो रस्ता चली आना

    कई बरसों से हूँ मैं चाहता लिखना ग़ज़ल ख़ुद पे
    सनम करने मुकम्मल बनके तुम मक़्ता चली आना
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    'फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है'
    फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है
    ख़्वाब सारे टूट कर कहीं सिफ़र जाने को हैं
    घोंसला वहम-ओ-गुमान का फिर से उजड़ जाने को है
    ज़ख़्म वो पुराने फिर निखर आने को हैं
    सारा जहाँ मानो गहरी नींद में सो गया है
    ये मन मेरा फिर उन हसीं यादों में खो गया है
    क़लम जैसे फिर कोई नज़्म लिखने की ज़िद पे अड़ी है
    शरीफ़ दिल की ये आदत आज भी बहुत बुरी है
    आँखों से नींद फिर गुम सी गई है
    सीने में धड़कन जैसे थम सी गई है
    ये चंचल हवाऍं ये गुम सुम घटाऍं
    मुझे ख़ुद से कहीं दूर ले जा रही हैं
    वो सुनसान सड़कें वो वीरान गलियाँ
    मुझे फिर से अपने पास बुला रही हैं
    हरेक परवाने को जैसे बस शमा' की तलाश है
    लहरों के मन में भी कोई अधूरी सी प्यास है
    सितारे अब चमक चमक कर थक से गए हैं
    पत्ते भी पूरी तरह शबनम से लिपट गए हैं
    वक़्त जैसे रेत की तरह फिसल रहा है
    चाँद तेजी से फ़लक की ओर बढ़ रहा है
    ये सुकून-ए-अँधेरा फिर से उतर जाने को है
    ये ख़ूब-सूरत नज़ारे फिर से बिखर जाने को हैं
    फिर एक रात यूँॅं ही गुज़र जाने को है
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