Karal 'Maahi'

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    तेरे बिना मुझे घर अजीब लगता है
    कहता नहीं हूँ मैं पर अजीब लगता है

    तब खा के ठोकरें मैं हुआ मुनव्वर पर
    अब प्यार से सजा दर अजीब लगता है

    नफ़रत का दौर है हसरतें न पूछो तुम
    चाहत का यार जौहर अजीब लगता है

    पत्थर मकाँ में दिल भी हुआ है पत्थर अब
    पिघले जो मोम कमतर अजीब लगता है

    गर शान में तुम उसकी ग़ज़ल कहो 'माही'
    मत भूलना कि मज़हर अजीब लगता है
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    आई बधाइयाँ मुझे बच्चे के जन्म पर
    इक माँ का जन्म छुप ही गया वंश-वाद में
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    कहो क्या ज़ात क्या पहचान है इक मुर्शिद-ए-कामिल
    बिना कण भर पढ़े मन भर क़सीदे सबको आते हैं
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    इबादत रक़्स का जौहर नहीं मंसब मोहब्बत है
    यक़ीं क्यूँकर दिलाऊँ मैं मिरा मज़हब मोहब्बत है
    Karal 'Maahi'
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    इक फाँस सीने में बिरह की है गड़ी
    सारे जतन करता हूँ रोने के सिवा
    Karal 'Maahi'
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    क्या हुआ जो हो गई ग़लती हमें मक़बूल जाना
    तुम समझ लेना ग़लत-फ़हमी थी और फिर भूल जाना

    भूलने से पहले हो जाएँ अगर हम रू-ब-रू तो
    जान कर अनजान बनना और फिर मशगू़ल जाना
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    Karal 'Maahi'
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    हमारी जान लेनी थी इशारा था इजाज़त है
    इशारे का जवाबी भी इशारा था इजाज़त है
    Karal 'Maahi'
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    "तलाश"
    मैं ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
    तलाश में अब
    यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
    तलाश का अब

    सवेर होने पे रात का हश्र याद कर के
    जहाँ था छूटा शुरू वहीं से करूँ लगूँ फिर
    तलाश में अब

    मैं झूठ ही दिल को दूँ दिलासा
    के पूछ सपनों से और अपनों से मशवरा कर
    तुझे तलाशूँ

    मैं धूप से पूछता जो तुझको गुज़रते देखा
    हो दूर से अक्स को तिरे ग़र निखरते देखा
    न खो दूँ फिर से ये सोच कर दौड़ मैं पड़ूँ पर
    पहुँच तिरे अक्स तक तुझे फिर से खो ही देता

    क़दम क़दम पर निशान खोजूँ
    फिरूँ हूँ मारा डगर डगर मैं
    कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर
    निकल पड़ा हूँ
    तलाश में अब

    कभी जो रातों को ग़र मैं निकलूँ
    तो जुगनुओं से पता लगाऊँ
    करूँ मैं पीछा
    हर इक सितारे का और फिर घर तलाश कर लूँ

    गुज़र पड़े दर्द हद से तो फिर
    ग़ज़ल कहूँ और दर्ज कर दूँ
    दबा के पलकों
    में अश्क़ अपने
    निकल पड़ूँ फिर तलाश में पर
    यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
    तलाश का अब
    के ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
    तलाश में अब
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    Karal 'Maahi'
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    है दर्द ही हमदर्द कोई आसरा तेरा नहीं
    मैं और मेरे ख़्वाब तेरे तू मगर मेरा नहीं
    Karal 'Maahi'
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    तू छोड़ के जाने के बहाने के लिए आ
    ये सिलसिला अब तोड़ कि आने के लिए आ

    बिन जिसके रही रात की ताबीर अधूरी
    तू अपने उसी ख़्वाब-ख़ज़ाने के लिए आ

    हर आँख लहू और जिगर ख़ौफ़ हो शामिल
    ऐसा भी सितम कोई तू ढाने के लिए आ

    तेरे ये सितम मुझको सताते ही नहीं अब
    तू मौत ही से मुझको डराने के लिए आ

    सब हार गया था मैं तुझे और मुझे तू
    ये राज़ ज़माने से छुपाने के लिए आ

    नादान कभी जान न पाया तेरे दिल की
    'माही' को तू समझा के बुझाने के लिए आ
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    Karal 'Maahi'
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