Karal 'Maahi'

Top 10 of Karal 'Maahi'

    तेरे बिना मुझे घर अजीब लगता है
    कहता नहीं हूँ मैं पर अजीब लगता है

    तब खा के ठोकरें मैं हुआ मुनव्वर पर
    अब प्यार से सजा दर अजीब लगता है

    नफ़रत का दौर है हसरतें न पूछो तुम
    चाहत का यार जौहर अजीब लगता है

    पत्थर मकाँ में दिल भी हुआ है पत्थर अब
    पिघले जो मोम कमतर अजीब लगता है

    गर शान में तुम उस की ग़ज़ल कहो 'माही'
    मत भूलना कि मज़हर अजीब लगता है
    Read Full
    Karal 'Maahi'
    10
    1 Like
    कहो क्या ज़ात क्या पहचान है इक मुर्शिद-ए-कामिल
    बिना कण भर पढ़े मन भर क़सीदे सब को आते हैं
    Karal 'Maahi'
    8
    2 Likes
    इबादत रक़्स का जौहर नहीं मंसब मोहब्बत है
    यक़ीं क्यूँकर दिलाऊँ मैं मिरा मज़हब मोहब्बत है
    Karal 'Maahi'
    7
    2 Likes
    इक फाँस सीने में बिरह की है गड़ी
    सारे जतन करता हूँ रोने के सिवा
    Karal 'Maahi'
    6
    1 Like
    क्या हुआ जो हो गई ग़लती हमें मक़बूल जाना
    तुम समझ लेना ग़लत-फ़हमी थी और फिर भूल जाना

    भूलने से पहले हो जाएँ अगर हम रू-ब-रू तो
    जान कर अनजान बनना और फिर मशगू़ल जाना
    Read Full
    Karal 'Maahi'
    5
    1 Like
    हमारी जान लेनी थी इशारा था इजाज़त है
    इशारे का जवाबी भी इशारा था इजाज़त है
    Karal 'Maahi'
    4
    1 Like
    "तलाश"
    मैं ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
    तलाश में अब
    यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
    तलाश का अब

    सवेर होने पे रात का हश्र याद कर के
    जहाँ था छूटा शुरू वहीं से करूँ लगूँ फिर
    तलाश में अब

    मैं झूठ ही दिल को दूँ दिलासा
    के पूछ सपनों से और अपनों से मशवरा कर
    तुझे तलाशूँ

    मैं धूप से पूछता जो तुझ को गुज़रते देखा
    हो दूर से अक्स को तिरे गर निखरते देखा
    न खो दूँ फिर से ये सोच कर दौड़ मैं पड़ूँ पर
    पहुँच तिरे अक्स तक तुझे फिर से खो ही देता

    क़दम क़दम पर निशान खोजूँ
    फिरूँ हूँ मारा डगर डगर मैं
    कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर
    निकल पड़ा हूँ
    तलाश में अब

    कभी जो रातों को गर मैं निकलूँ
    तो जुगनुओं से पता लगाऊँ
    करूँ मैं पीछा
    हर इक सितारे का और फिर घर तलाश कर लूँ

    गुज़र पड़े दर्द हद से तो फिर
    ग़ज़ल कहूँ और दर्ज कर दूँ
    दबा के पलकों
    में अश्क अपने
    निकल पड़ूँ फिर तलाश में पर
    यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ
    तलाश का अब
    के ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने
    तलाश में अब
    Read Full
    Karal 'Maahi'
    3
    1 Like
    है दर्द ही हमदर्द कोई आसरा तेरा नहीं
    मैं और मेरे ख़्वाब तेरे तू मगर मेरा नहीं
    Karal 'Maahi'
    2
    1 Like
    तू छोड़ के जाने के बहाने के लिए आ
    ये सिलसिला अब तोड़ कि आने के लिए आ

    बिन जिस के रही रात की ता'बीर अधूरी
    तू अपने उसी ख़्वाब-ख़ज़ाने के लिए आ

    हर आँख लहू और जिगर ख़ौफ़ हो शामिल
    ऐसा भी सितम कोई तू ढाने के लिए आ

    तेरे ये सितम मुझ को सताते ही नहीं अब
    तू मौत ही से मुझ को डराने के लिए आ

    सब हार गया था मैं तुझे और मुझे तू
    ये राज़ ज़माने से छुपाने के लिए आ

    नादान कभी जान न पाया तेरे दिल की
    'माही' को तू समझा के बुझाने के लिए आ
    Read Full
    Karal 'Maahi'
    1
    1 Like