दुनिया में ये हरदिन हर-पल होता है
चाहत में ही आशिक़ सब कुछ खोता है
चाहत में ही आशिक़ सब कुछ खोता है
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इश्क़ में सब कुछ हक़ीक़त
मैं भी क्या क्या सोचता हूँ
मैं भी क्या क्या सोचता हूँ
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फ़रेबी लोग थे सारे मिरे अपने पराए सब
यहाँ अहमक़ बना हूँ मैं भरोसा कर के लोगों पे
यहाँ अहमक़ बना हूँ मैं भरोसा कर के लोगों पे
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दिल के दरवाज़े पे पहरेदार कैसा
चाहने वालों से ये व्यवहार कैसा
चाहने वालों से ये व्यवहार कैसा
इक नज़र में दिल मिरा घाइल हुआ है
उस की आँखों में छुपा हथियार कैसा
जो निभानी पड़ रही मजबूरियों में
सोचता हूँ मैं भी ये किरदार कैसा
भूख की ख़ातिर जो फिरता दर बदर है
वो कभी समझा कहाँ त्यौहार कैसा
इश्क़ के अंजाम से मैं डर रहा हूँ
कर रहा 'रंजन' ये कारोबार कैसा
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तुम्हारे हुस्न का वर्णन है मुश्किल
तुम्हें ऐसे तराशा जा चुका है
तुम्हें ऐसे तराशा जा चुका है
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